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Saturday, September 14, 2013

हिन्दी दिवस

अमर शहीद राजीव भाई के व्याख्यान से .......

अभी हम जो शिक्षा लेते हैं वो मैंकाले की है. दुर्भाaसे मैकाले जो पाठ्यक्रम हम को देगया वो इतना घटिया और रद्दी है कि जिंदगी मैं कभी काम नहीं आता. हम पढ़ते हैं, रटते है और कक्षा में जाकर उल्टी कर आते हैं. 100 में से 96 और 98 नंबर लाकर हम क्या करें. ये शिक्षा कभी जिंदगी में काम नहीं आती. में अपना उदाहरण देता हूँ. सालों साल में पढ़ाई की अपनी जिंदगी बर्बाद की. में नहीं पढ़ता तो बहुत अच्छा होता. मैं ने जितने साल पढ़ाई की और जितना पैसा मेरे माँ बाप ने खर्च किया, जितना पैसा मेरे माँ बाप ने मेरे ट्यूशन पर मेरे खर्च किया. अगर में पढ़ने नहीं जाता तो वो पैसा वचता. मैं उससे कोई धंधा और व्यापार करता तो करोड़पति होता. क्या पढ़ाई हुई है मेरी. मैने बचपन में पढ़ा है (अ +ब)२ =अ 2+ब2+२अब (जे-य)2=अ 2+ब 2-२अब . अब मुझे ये समझ में नहीं आता की इस शिक्षा का मेरे जीवन में का उपयोग है. मेरे शिक्षक ने मुझे पढ़ाया घंटो-घंटो मैंने ने रट़ा और अभ्यास किया ना जाने कितने किलो कागज मेने बर्बाद किया फिर भी मुझे नहीं पता में उस ज्ञान से क्या करूँ. मेने अपने शिक्षक से पूछा आपने मुझे ये क्यों पढ़ाया मेरे जिंदगी में तो ये कामनहीं आया. तो मेरे गणित के अद्यापक द् ने जबाब दिया की काम तो मेरे भी नही आया, मुझे भी किसी ने पढ़या था मेने तुम्हें पढ़ा दिया. अब अगर इस ज्ञान का कोई उपयोग नहीं है तो फिर ये भेड चाल किसलिए है. जो काम नही आता है उसको पढ़ना ही क्यों. बचपन में मुझे पढ़ाया गया की अमरीका का पहला राष्ट्रपति कौन था. मुझे मालूम है की पहला राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन था पर मैं करूँ क्या . मैं सब्जी खरीदने बाजार जाता हूँ और बोलता हूँ की अमेरका का पहला राष्ट्रपति जाज वाशिंगटन था क्या वो मुझे सब्जी देगा? फालतू में रटा रटा कर मेरा दिमाग़ खराब कर दिया. मुझे नही मालूम की हमारे कुल का पहला इंसान कौन था लेकिन अमेरिका का पहला राष्ट्रपाति मालूम है. मुझे तो इतना दुख होता है कि उनका पहला ही नहीं 250 राष्ट्रपति भी मालूम हैं मुझे, और अपने कुल के ढाई आदमी के नाम नही मालूम मुझे. अपने दादा के पहले की पीढ़ी के नाम मुझे नहिएं मालूम क्या करना है ऐसी शिक्षा से. इसका उपयोग क्या है. बचपन में मैं मुझे पढ़ाया की कनाडा की जलवायु कैसी है. मुझे कभी कनाडा जान नहीं है और नही कभी कनाडा मेरे घर आएगा. तो फिर उसकी जलवायु पढ़कर मुझे क्या हासिल होगा. अगर में शिवपुरी में रहता हूँ और वहाँ की जावायु पढ़ूँ तो मुझे काम आएगी, कनाडा की जलवायु क्या काम आएगी. अगर में भविष्य में कभी कनाडा गया जिसकी की दूर दूर तक कोई संभावना नही है; तब उसका कुच्छ उपयोग हो सकता है. उसके लिए पढ़ और रट रट के दिमाग़ खराब करने की कोई ज़रूरत नहिएं है.

इतिहास की वात करे तो पढ़ते है; अकबर बड़ा महान था; तो मैं क्या करूँ ?मेरी जिंदगी में उससे मुझे क्या फायदा होगा.आप अपने बारे में ईमानदारी से सोचो आपने जो पढ़ा है उसमें से कितना आपके काम आया. शायद आप 100 का नंबर निकालेंगे तो 5 भी काम नहीं आया.जो काम नहीं आया फिर उसको पढ़ा क्यों. आप दूसरी तरीके से उल्टा सोचो , जितना पढ़ा है उसका कितना याद है. याद उतना ही रहता है जिसे दिमाग़ इस्तेमाल करता है; बाकी कचरे को दिमाग़ वैसे ही निकाल के फेंक देता है. जो याद ही ना रहे उसे पढ़ना और पढ़ना क्यों. इसलिए ये व्यवस्था बदलना बहुत ज़रूरी है. हमारे बच्चों के उपर इतना बोझा हो गया है की इसने बच्चो के जीवन को ख़तम सा कर दिया है. कभी कभी मुझे इतना अफ़सोस होता है सुनकर की 12 वी का परिणाम आया और उससे दुखी होकर जब बच्चे आत्म हत्या करलेते हैं; सिर्फ़ असफल होने से या कम अंक आने से। .

मैं तो मानता हूँ की बच्चे असफल नहीं होते परीक्षा के पद्यति असफल हुई है. बच्चों के बारे में सारी दुनिया कहती है की वो तो कच्ची मिट्टी के घड़े जैसे होते हैं जैसा चाहो ढाल सकते हो. हमारी बच्चे को अध्यापक और शिक्षा पद्यति कुछ नही दे सके तो इस में दोष किसका है. मुझे तो लगता ऐसे अध्यापकों को असफल होना चाहिए. क्या मज़ाक है इस पद्यति मैं 100 में से 90 नंबर , 95 नंबर लाओ तो आप बहुत होशियार हैं 30 , 35 नंबर लाने बाले को बिल्कुल बेकार समझा जाता है. न्यूटन को तो कभी तीस से ज़्यादा नंबर नहिएं मिले उसे तो स्कूल ने निकल दिया था बेकार मानकर। स्कूल से जाने के बाद उसका दिमाग़ खुल गया, उसने गिरते हुए सेब के फल को देखा और गुरुत्वा कर्षण का सिद्धांत दिया. जो आदमी स्कूल में फेल हो गया था आज बड़े बड़े विद्यार्थी उसके उपर शोध करते हैं. इसका सीधा सा मतलब है किसी के स्कूल में असफल या सफल होने से जीवन में सफलता और असफलता का कोई संबंध नहीं है. आप अगर आइंस्टाइन की कहानी पढ़ोगे तो आइंस्टाइन तो भी 9 कक्षा के आयेज पढ़ नहीं पाया कभी. स्कूल ने उसको निकल दिया. उसीआइंस्टाइन ने सारी दुनिया को उर्जा और द्रव्यमान के संबंध को स्थापित किया जिसे हम E=MC2 के समीकरण के रूप में जानते है. और दुनिया एक ऐसे आदमी को पूजती है जो 9 कक्षा के आगे नहीं पढ़ा.

में तो इसी देश की ऐसे बहुत सारी कहानिया जानता हूँ जो इस बात को बार बार प्रतिपादित करती हैं की स्कूली शिखा में 9, 10 या 16 पास करने से कुछ नहीं होता. धीरू भाई अंबानी जो 9 क्लास फैल था कभी पेट्रोल पंप पर नौकरी करता था 4.5 लाख करोड़ का रिलायंस का कारोबारी साम्राज्या खड़ा करे छोड़ गया. इसका अर्थ यही है ज्ञान और योग्यता का डिग्री से कोई संबंध नहीं है. घन श्याम दास बिरला सिर्फ़ कक्षा 4 पास, स्कूल और गाँव छोड़ कर निकल गये लोटा लेकर मुंबई पहुँच गये; और इतना बड़ा बिरला का कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर दिया. जो आज लाखों करोड़ का है; कक्षा 4 पास आदमी ने क्या है. बिरला जी कहा करते थे की कक्षा पास करना कोई महत्व की बात नहीं है जीवन की तुलना में, हम जीवन को जीने वाली शिक्षा हम अपने विद्यार्थियों को दे. ऐसी शिक्षा व्यवस्था हम बनाएँ जिसमें उपाधि का महत्व ना हो ज्ञान का महत्व हो; परीक्षा का महत्व ना हो सीखने का महत्व हो; पढाने का महत्व न हो सिखाने का महत्व हो; अध्यापक भी सीखें और विद्यार्थी भी सीखें; दोनो सीखने की पक्रिया में आगे बढ़े.ऐसी शिक्षा व्यवस्था हम बनाना चाहते हैं. हमारी शिक्षा व्यवस्था मात्रा भाषा पर आधारित होगी अँग्रेज़ी पर नहीं . अंग्रेज आए थे तो अँग्रेज़ी आई थी, अंग्रेज गये थे तो अँग्रेज़ी भी चली जानी चाहिए थी. क्यों रख ली हमने? हम अपने बच्चों को अँग्रेज़ी में पढाते है और मार मार के पढाते है सिखाते है. भारत का बच्चा गंणित में पास हो जाता है,भौतिकी मैं पास हो जाते है,रसायन में पास हो जाते हैं लेकिन अँग्रेज़ी में फैल हो जाता है. होना ही चाहिए उनको फैल क्योंकि अँग्रेज़ी विदेशी भाषा है. आप मुझे एक अंग्रेज दिखाइए जो हिन्दी में पास हो जाय तो में अँग्रेज़ी मैं पास हो सकता हूँ. जब कोई अंग्रेज हिन्दी में पास नही हो सकता है तो हम भारतीय से अपेक्षा क्यों करते हैं की वो अँग्रेज़ी में पास हो जाएँ.
अँग्रेज़ी भाषा ही नहीं है पास होने लायक ये तो एक दम रद्दी है . इस भाषा का जब मैने इतिहास पढ़ा तो पता चला की पाँचवी शताब्दी में तो ये भाषा आई इसका मतलब है की मुश्किल से 1500 साल पुरानी है. हमारी भाषा तो करोड़ों वर्ष पुरानी है संस्कृत, हिन्दी, मराठी, कन्नड़,मलयालम. दुनिया की सबसे रद्दी भाषा है अँग्रेज़ी इसकी कोई अपनी व्याकरण नहीं है जो सूद्ढ़ हो और अपनी हो. आपको एक उदाहरण देता हूँ. अँग्रेज़ी में एक शब्द है "PUT" इस का उच्चारण होता है पुट दूसरा शब्द है "BUT" इसका उच्चारण है बट इसी तरह "CUT " को कट बोला जाता है जबकि तीनों शब्द एक समान हैं. इसकी बजह है भाषा के व्याकरण का ना होना. इसी तरह कभी "CH" का उच्चारण "का" होता है तो कभी "च" कोई नियम नहीं चलता है. इस भाषा के कितनी बड़ी कमज़ोरी है; अँग्रेज़ी में एक शब्द होता है "SUN" जिसका मतलब होता है सूरज. में सारे अँग्रेज़ों को चुनौती देता हूँ की सूरज का दूसरा शब्द अँग्रेज़ी में से ढूँढ कर दिखाए यानी की "SUN" का पर्यायवाची; पूरी अँग्रेज़ी में दूसरा शब्द नही है जो सूरज को बता सके. अब हम संस्कृत की बात करें "सूर्य" एक शब्द है इसके अलावा दिनकर , दिवाकर, भास्कर 84 शब्द हैं संकृत में. इसी तरह एक शब्द हैं "MOON" अँग्रेज़ी मैं इसके अलावा कोई शब्द नहीं है; संकृत में 56 शब्द है चाँद के लिये . इसी तरह पानी के लिए भी जहाँ अँग्रेज़ी में एक शब्द है पानी के लिए "WATER" चाहे वो नदी का हो नाले का या कुए का.संस्कृत में हर पानी के लिए अलग शब्द है, सागर के पानी से लेकर कीचड़ के पानी तक सभी के लिए अलग शब्द है. कितनी ग़रीब भाषा है शब्द ही नही है. चाचा भी "अंकल" मौसा भी "अंकल" फूफा भी "अंकल" और फूफा का फूफा भी "अंकल" और मौसा का मौसा भी "अंकल" कोई शब्द ही नहीँ है अंकल के अलावा. इसी तरह चाची,मामी,मौसी सभी के लए "आंटी" कोई शब्द ही नहीँ है इसके अलावा.


हम तो मूर्ख हैं जो इस अँग्रेज़ी के चक्कर में फस गये. असल में अकल उन्ही की मारी गयी है जो अँग्रेज़ी सीख गये हैं. जिन्होने नहीं सीखी वो ठीक है. पता हैं में कुछ लोगों के घरो में जाता हूँ. मेरा एक प्रण हैं की में होटल में रुकूंगा नहीं और घर में ही खाना खाऊंगा . इसलिए लोगों को मुझे किसी भी तरह घर में रुकाना पड़ता है और घर में ही खाना खिलाना पड़ता है. कभी-कभी में अँग्रेज़ी पड़े लिखे घरों में भी जाता हूँ. वे अँग्रेज़ी की बजह से मुझे कैसे मूर्ख दिखाई देते हैं उसका उदाहरण देता हूँ. वो ना तो अंग्रेज हैं और ना हिन्दुस्तानी वो खिचड़ी हैं.वो खिचड़ी कैसी हैं; किसी परिवार में गया, बाप का नाम रामदयाल माँ का नाम गायत्री देवी बेटे का नाम "टिनकू". रामदयाल और गायत्री देवी का येटिनकू कहा से आगया. जब में उन से पूछता हूँ की आपको टिनकू का मतलब पता है तो उनको नहीं पता होता है. ऐसे मूर्ख लोग है अर्थ मालूम नही नाम रख लिया टिनकू. फिर में उनको अँग्रेज़ी शब्द कोष दिखता हूँ, अँग्रेज़ी की सबसे पुराना शब्दकोष है वेबस्टेर; जिसमें टिनकू का अर्थ होता है "आवारा लड़का". जो लड़का माँ बाप की ना सुने वो टिंकू। और हम, पढ़े लिखे मूर्ख लोग क्या कर रहें है, अच्छे ख़ासे आज्ञाकारी पुत्र को दिन भर आवारा बुलाते रहते हैं इस अग्रेज़ी के चक्कर में. अंगेजी पढ़े लिखे घरों में डिंपल,बबली,डब्ली,पपपी, बबलू,डब्लू जैसे बेतुके और अर्थहीन नाम ही मिलते हैं. भारत में नामों की कमी होगई है क्या? कभी कभी में इससे भी बड़ी मूर्खताएँ में देखता हूँ . कभी किसी अधकचरे हिन्दुस्तानी के घर में जाऊं तो रोब झाड़ने के लिए अँग्रेज़ी बोलते हैं चाहे ग़लत ही क्यों ना बोले. बो चाहे तो हिन्दी में भी बोल सकता है लेकिन रोब झाड़ने के लिए अँग्रेज़ी मैं ही बोलेगा। वो वोलेगा "ओ राजीव दीक्षित जी she is my misses " तो मैं पूछता हूँ " really" ! she is your misses ?". क्यों की उसको "मिसेज़" का अर्थ नहीं मालूम। .
मिसस का अर्थ क्या है ?

किसी भी सभ्यता में जो शब्द निकलते उनका अपना सामाजिक इतिहास और अर्थ होता है. इंगलेंड की सभ्यता का सबसे ख़राब पहलू ये है जो आपको कभी पसंद नहिएं आएगा . की वन्हा एक पुरुष और एक स्त्री जीवन भर साथ कभी नहिएं रहते; बदलते रहते है कपड़ों की तरह. मेरे कई दोस्त हैं इंग्लेंड और यूरोप में है उनकी 40 -40 शादियाँ हो चुकी और और 41 वी करने के तैयारी है. एक पुरुष कई स्त्रियों से संबंध रखता है एक स्त्री कई पुरुषों से संबंध रखती है. तो पत्नी को छोड़ कर पुरुष जितनी स्त्रियों से संबंध रखता है वो सब "मिसेज़" कहलाती है. इसका मतलब हुआ कोई भी महिला जो पत्नी नहिएं है और जिसके साथ आप रात को सोएं . अब यहाँ धर्म पत्नी को मिसेज़ बनाने में लगे हैं; मूर्खों के मूर्ख. "मिस्टर" का मतला उल्टा, पति को छोड़ कर पुरुष जिसके साथ आप रात विताएँ। छोड़िए इन अँग्रेज़ी शब्दों को इनमें कोई दम नहिएं है. एक तो सबसे खराब अँग्रेज़ी शब्द है "मेडम" पता नहीं है लोग बोलते कैसे है. आप जानते है यूरोप में मेडम कौन होता है. ऐसी सभ्यता में जहाँ पर स्त्री गमन होगा वहां वेश्यावृति भी होगी. पर स्त्रीगमन पर पुरुषगमन चरम पर होगा . तो वैश्याएँ जो अपने कोठों को चल़ाती हैं अपनी वेश्यावृति के धंधे को चलाने के लिए. ऐसी वैश्या प्रमुख को वहां मैडम कहा जात है.हमारे यहाँ ऐसे मूर्ख लोग हैं जो अपनी बहिनों को मैडम कहते है, अपनी पत्नियों को मैडम कहते है. और पत्नियों को भी शर्म नहिएं आती मैडम कलवाने में वो भी कहती हैं मैडम कहो मुझको. पहले जान तो लो इसका मतलब फिर कहलबाओ. अपने भारत में कितने सुंदर सुंदर शब्द हैं जैसे "श्रीमती " श्री यानी की लक्ष्मी मति यानी बिद्धि जिसमें लक्ष्मी और सरस्वती एक साथ निवास करें वो श्रीमती उसको हमने मिसेज़ बना दिया. देश में मुर्ख अँग्रेज़ी पढ़े लिखे; इन्होने बड़ा बेड़ा गर्क किया इस देश में बड़ा सत्यानाश किया. पहले तो अँग्रेज़ी भाषा ने किया फिर इन्होने और ज़्यादा किया. मेरा आपसे हाथ जोड़ के निवेदन है इस अँग्रेज़ी भाषा के चक्कर में मत पड़िये कुछ रखा नहीं है इसमें।


कभी कभी तो मैं जब लोगों के घरों में जाता हूँ इतना गुस्सा आता है मुझे. इन अँग्रेज़ी पढ़े लोगों के यहाँ छोटे छोटे बच्चे होते है उनसे माता पिता कहते हैं "अंकल आए हैं अंकल को पोयम सुनाओ". मैं कहता हूँ भाई मैं अंकल नहीं हूँ. मुझे या तो मामा बना लो या चाचा बनो लो दोनो में ही आपका फ़ायदा है और मेरे भी फ़ायदा है. अंकल बनने में तो कुछ रखा नहीं है. फिर उनके माता पिता को कहता हूँ आप इनको पोयम क्यों सुंनबाते हो कविता सुनवाओ ना. तो उनको पोयम और कविता का अर्थ ही नहीं पता है. पोयम अलग है कविता अलग है. और वो बच्चे चालू हो जाते हैं टेप रिकारडर की तरह और पोयम सुनाते हैं मुझको। "रेन रेन गो अवे, कम एगेन अनोदर डे, लिटल बेबी वांट्स टू प्ले। " अब में बच्चे से पूछता हूँ तुम्हे मतलब मालूम है इसका. तो वो कहता है नहीं मालूम. तब में पूछता हूँ किसने सिखाया वो कहता है मम्मा ने. मम्मा को पूछो तो उसे भी अर्थ नहीं मालूम उसे टीचर ने बताया. टीचर को पूछो तो उनको भी अर्थ नहीं मालूम।। तो रटाया क्यों फिर बच्चों को? फिर बच्चों को में बताता हूँ इसका अर्थ ये है. "वारिश वारिश तुम चली जाओ मत आओ क्यों की मुझे खेलना है". प्रार्थना के रूप में ये कविता है; करोड़ों बच्चॉ ने अगर ये कविता गायी और ईश्वर ने सुन ली तो. वारिश को वापस बुला लिया तो क्या होने वाला है? वारिश नहीं होगी तो सूखा पड़ेगा. और सूखा पड़ेगा तो आप भी भूकों मरोगे , में भी मारूँगा और किसान भी मरेंगे. इतनी अकल नहीं है की "रेन रेन गो अवे" कितनी ख़तरनाक चीज़ है. हमारे भारत में 60 प्रतिशत खेती वारिश से होती है; केवल 40 प्रतिशत में ही खेती की व्यवस्था है. तो हमें तो वारिश ज़्यादा चाहिए. और ऐसी कविता देशी भाषा में ही हो सकती है अँग्रेज़ी में नहीं . मराठी भाषा के एक कविता है अर्थ इसका बहुत सीधा है. वो कविता है
आओ आओ पाऔशा;
टोला दे तो पैसा;
पैसा झाला खोता;
पाऔ साला मोटा.
( वारिश वारिश तुम जल्दी जल्दी आओ नहिएं आयोगे तो मैं पैसा देने को तैयार हूँ)

मात्रा भाषा की कविता बारिश को बुलाने वाली होती है और अँग्रेज़ी कविता वारिश को भगाने वाली होती है क्योंकि इंग्लेंड में मौसम खराब होता है, वारिश कभी भी हो जाती है. इस लिए वहाँ की कविता में वारिश से जाने की बात होती है.

अँग्रेज़ी में तीन "W" होते है जिनका क़ोई भरोसा नही है. पहला है "WEATHER" (मौसम) कोई भरोसा नहिएं है कब बरसेगा कब धूप होगी; दूसरा है "WIFE" (पत्नी) आज आपकी है कल छोड कर जा सकती है; तीसरा है WORK(काम) आप किसी के यहाँ वीस साल भी नौकरी करें कोई भरोसा नहीं कि कल भी आप को रखेगा जिस दिन चाहेगा आपको निकाल दे देगा. भारत में ये तीनों ही पक्के है. मौसम एक दम पक्का है कब जाड़ा होगा , कब वारिश होगी कब गर्मी होगी सब पक्का है. और पत्नी तो सबसे ज़्यादा पक्की है सात सात जानम तक साथ नहिएं छोड़ती इतनी पक्की वाईफ तो दुनिया में कहीं नहिएं है. और वर्क यानी काम भी बहुत पक्का है. फिर हमारी कविताएँ तो हमारे समाज , संस्कृति , देश और शभयता के हिसाब से होनी चाहिए. अँग्रेज़ों के कविताएँ हम क्यों सीखे? व्यक्तिगत बात चीत में तो अँग्रेज़ी बिल्कुल मत बोलिए. एक बात और अपने दिमाग़ से निकाल दीजिए की अँग्रेज़ी अंतरराष्ट्रिय भाषा है. अँग्रेज़ी 200 में से केवल 14 देशों में बोली जाती है. बाकी सब देशों की अपनी अलग अलग भाषाएँ है जैसी की फ्रांस, रूस, हलेंड, जर्मनी, चीन, जापान . अँग्रेज़ी केवल उन्ही देशों में है जो अँग्रेज़ों के गुलाम थे जैसे की न्यूजीलेंड , कनाडा, पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश, आस्ट्रेलया, अमेरिका. ये सब अँग्रेज़ों के गुलाम देश थे। इसलये अँग्रेज़ी यहाँ पर है. अँग्रेज़ी दुनिया के सबसे बेकार भाषा है, अँग्रेज़ी में शब्दों की संख्या सबसे कम और व्याकरण सबसे मूर्खता वाला है.
साभार अमर शहीद भाई राजीव दीक्षित
 
ये राजीव भाई के हिन्दी भाषा के ओजस्वी व्याख्यान है आप जरूर सुने और पाठक जी तक पहुचाये 
http://98.130.113.92/Macaulay_Shikshan_Paddhati.mp3

Wednesday, September 11, 2013

बेबी (मिल्क) पावडर , हेल्थ टॉनिक , लाइफबॉय व् रिफाइंड तेल की सच्चाई : राजीव दिक्सित

1. बेबी (मिल्क) पावडर 
हमारे देश में एक अमेरिकी कंपनी है - नेस्ले , नेस्ले बेबी पावडर (डब्बे का दूध) बेचती है | यूरोप के देशों में बेबी पावडर बिकता नहीं, यूरोप के देशों में बेबी पावडर को बेबी किलर कहते हैं | मैंने यूरोप के कई देशों में देखा है, बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे रहते हैं और सरकार की तरफ से उन होर्डिंगों पर प्रचार किया जाता है कि "आप अपने बच्चे को बेबी पावडर मत खिलाईये" | क्यों ? क्योंकि इसमें जहर है, तो पुरे यूरोप में ये जो बेबी पावडर "बेबी किलर" कहा जाता है वही बेबी पावडर धड़ल्ले से भारत के बाजार में बिक रहा है और बहुत वर्षों तक इस देश में जो बेबी पावडर बिकता था, उसके डब्बे पर कुछ भी लिखा नहीं होता था, जब कुछ अच्छे लोगों ने इस मुद्दे को उठाया, हमारे जैसे विचार वाले कुछ डोक्टरों ने संसद पर दबाव बनाया तब भारत की सरकार ने सिर्फ इतना सा संसोधन कर दिया कि "कंपनियों को बेबी पावडर के डब्बे पर ये लिखना आवश्यक होगा कि माँ का दूध बच्चे के लिए सर्वोत्तम है", बस बात ख़त्म | होता ये कि भारत सरकार इन डब्बे के दूध को भारत में प्रतिबंधित कर देती, लेकिन नहीं | और भारत की पढ़ी-लिखी माताओं की हालत भी कुछ वैसी ही है, जो जितनी ज्यादा पढ़ी-लिखी हैं वो उतना ही ज्यादा बेबी पावडर पिलाती हैं अपने बच्चों को | कभी-कभी तो मुझे ये लगता है कि जैसे भारत में जब से बेबी पावडर आया है तभी से बच्चे जवान हो रहे हैं, बिना बेबी पावडर के तो लोग बड़े ही नहीं हुए होंगे इस देश में ? कुछ ऐसा ही माहौल बनाया गया है इस देश में पिछले कुछ वर्षों से, और विरोधाभास क्या है इस देश में कि बाजार में बेबी पावडर भी बिक रहा है और "माँ का दूध बच्चे के लिए सर्वोत्तम है" इस विषय पर सेमिनार भी आयोजित किये जाते हैं, करोड़ो रूपये खर्च कर के | सीधा ये नहीं करते कि बेबी पावडर को प्रतिबंधित कर दे इस देश में | जिनको समझना चाहिए कि "माँ का दूध बच्चे के लिए सर्वोत्तम है" वो सेमिनार में आते नहीं और जिनको ये समझ है वो कोई कैम्पेन चलाते नहीं, ये इस देश का दुर्भाग्य है | 
इसे पढ़े  ------ http://www. babymilkaction.org/pages/ history.html
2. हेल्थ टॉनिक
हमारे देश में हेल्थ टॉनिक के नाम पर कई कंपनियाँ अपने उत्पाद बेचती हैं, जैसे होर्लिक्स, मालटोवा, बोर्नविटा, कॉम्प्लान,बूस्ट, प्रोटिनेक्स और खूबी की बात है कि इनमे हेल्थ के नाम पर कुछ भी नहीं है | कैसे ? ये कंपनियाँ इन हेल्थ सप्लीमेंट में मिलाती क्या हैं वो भी आप जान लीजिये | मालटोवा, बोर्नविटा, कॉम्प्लान और बूस्ट बनता है मूंगफली (सिंघदाना) की खली से | खली समझते हैं आप ? मूंगफली, सरसों, आदि  का तेल निकालने के बाद जो उसका कचरा निकलता है, उसी को खली कहते है और भारत में गाय, बैल,भैंस जैसे जानवरों को खिलाने के लिए इस खली का प्रयोग किया जाता है | ये मालटोवा, बोर्नविटा, कॉम्प्लान और बूस्ट  इसी मूंगफली की खली से बनाया जाता है, जो खली हमारे देश में जानवरों को खिलाया जाता है वही इस देश में अपने को पढ़े-लिखे और बुद्धिमान कहने वाले लोग खा रहे हैं | बाजार में आप चले जाइये, ये मूंगफली की खली 20 -25 रूपये प्रति किलो के हिसाब से मिल जाएगी आपको | आप सौ डब्बे भी इन हेल्थ टोनिकों के खा लीजिये या अपने बच्चों को खिला दीजिये, कुछ नहीं होने वाला उससे | और इसके बदले मूंगफली/सिंघदाना दीजिये गुड के साथ तो जितना प्रोटीन इससे मिलता है, जितनी कार्बोहाईड्रेट इससे मिलती है, या और भी जितनी स्वास्थ्यवर्धक तत्व इससे मिलती है, उतना 100 पैकेट इन उत्पादों के खाने से भी नहीं मिल सकती |  ये अपने डब्बे पर लिखते है कि इससे विटामिन मिलता है, प्रोटीन मिलता है, कैल्सियम मिलता है, वगैरह वगैरह, लिखने में क्या जाता है ? किसी ने कभी टेस्ट कर के कोई समान ख़रीदा है क्या ? अरे मिटटी में भी 18 तरह के Micro Nutrients होते हैं तो क्या हम मिटटी खायेंगे ?
ऐसा ही एक और हेल्थ टॉनिक है - हॉर्लिक्स - हॉर्लिक्स में क्या है ? हॉर्लिक्स में है गेंहूँ का आटा, चने का सत्तू, जौ का सत्तू | बिहार में हमलोग उसको कहते हैं सत्तू और अंग्रेजी में कहते हैं - हॉर्लिक्स | आप किसी से पूछिये कि सत्तू खाओगे ? तो कहेगा कि - क्या फालतू की बात कर रहे हो और पूछेंगे कि हॉर्लिक्स खाओगे तो कहेगा -हाँ खायेंगे | क्योंकि अंग्रेजी का नाम है, और बड़ा भारी नाम है हॉर्लिक्स | उस पर साफ़-साफ़ लिखा है "It's malted " और malted का मतलब ही होता है आटा/सत्तू | जौ का सत्तू, चने का सत्तू बाजार से खरीद लीजिये 50 -60 रूपये किलो मिल जायेगा और और हॉर्लिक्स बिक रहा है 400 रूपये किलो के हिसाब से |
भारतीय बाजार में जितने हेल्थ टोनिक मिल रहे हैं उनसे एक पैसे का हेल्थ नहीं मिलता और भारत के लोग हर साल 1500 करोड़ का हेल्थ टोनिक खरीद कर पैसा विदेश भेज रहे हैं | सिर्फ mental satisfaction है और कुछ नहीं ? हमारे देश के लोग अजीब किस्म के निराशावाद में जी रहे है |  ये इग्नोरेंस अनपढ़ लोगों में होता तो मुझे समझ में भी आता लेकिन भारत के पढ़े लिखे लोगों में ये सबसे ज्यादा है | इनमे मिलाये हुए तत्वों की सूचि नीचे दी गयी है जो कि इनके UK की वेबसाइट से ली गयी है, भारत के वेबसाइट पर ये उपलब्ध नहीं है|      
             
Ingredients of Horlicks : Wheat Flour (55%), Malted Barley (15%), Dried Whey, Sugar, Calcium Carbonate, Vegetable Fat, Dried Skimmed Milk, Salt, Vitamins (C, Niacin, E, Pantothenic Acid, B6, B2, B1, Folic Acid, A , Biotin, D, B12), Ferric Pyrophosphate, Zinc Oxide.May contain traces of soyabeans..
Source  : http://www.horlicks.co.uk/ downloads/Horlicks- Traditional-2011.pdf 
3. लाइफबॉय 
दुनिया में तीन तरह के साबुन होते हैं | एक होते हैं- बाथ सोप-मतलब नहाने का साबुन, दुसरे होते हैं-टॉयलेट सोप - मतलब हाथ धोने का साबुन और एक होता है - कार्बोलिक सोप - मतलब जानवरों को नहलाने का साबुन | और ये लाइफबॉय साबुन, कार्बोलिक साबुन है, ये कंपनी वाले कहते हैं, मैं नहीं कह रहा हूँ | और यूरोप के देशों में जिस लाइफबॉय से कुत्ते नहाते हैं, बिल्लियाँ नहाती हैं, घोड़े नहाते हैं उसी लाइफ बॉय से भारत के लोग रगड़-रगड़ के नहाते हैं | प्रचार देख के ऐसा हमारा दिमाग ख़राब हुआ है कि अकेले भारत में ये लाइफबॉय साबुन एक साल में 7 करोड़ बिक जाता है और तो और कुछ दिन पहले तक लाइफबॉय साबुन बिक रहा था "Family Doctors Welfare Association of India द्वारा प्रमाणित" के नाम से | ये कौन सा एसोसिएसन है ? ये कब बना ? और कब इन्होने लाइफबॉय को प्रमाण-पत्र दे दिया थे ? लेकिन रोज इनका विज्ञापन था ये और हम सब ख़ामोशी के साथ बैठे हुए इसको देख रहे हैं कि कैसे देश के साथ भयंकर गद्दारी और बेईमानी का काम चल रहा है | और लाइफबॉय के प्रचार पर ध्यान दीजियेगा, उनका कहना है कि "ये मैल में छिपे कीटाणुओं को धो डालता है" ध्यान दीजियेगा, मैल को धोता है, कीटाणुओं को नहीं धोता और कीटाणुओं को धोता है, मारता नहीं | सबसे घटिया साबुन भारत के बाजार में बिक रहा है और हम इस्तेमाल कर रहे हैं | इसके घटिया होने का प्रमाण क्या  है ? साबुन में केमिकल जितना ज्यादा, साबुन उतना ही घटिया | मैं आपको इसका प्रमाण देता हूँ, आप लाइफबॉय से नहाइए, नहाने के बाद जब शरीर सुख जाये  तो नाख़ून से शरीर पर लाइन खिचिये, सफ़ेद रंग की लाइन खिंच जाएगी, ये लाइन कैसे खिंची ? लाइफबॉय के केमिकल कचरे ने आपके  त्वचा के प्राकृतिक तेल को पू री तरह से सुखा दिया, तो त्वचा एकदम रुखी-सुखी हो  गयी और बार-बार जब आप इस प्रयो ग को करेंगे तो एक दिन आपको एक् जीमा होना ही है, सोरैसिस होना ही है, अन्य चमड़े के रोग होने ही वाले  हैं | एक दिन मैंने इस कंपनी के बैलेंस शीट में से इस लाइफबॉय का लागत खर्च (Cost of Production) निकाला तो वो है 2 रुपया और भारत के बाजार में बिकता है 18 -20 रुपया में, अब आप इसका लाभ प्रतिशत निकाल लीजिये |  
http://www.wisegeek.com/what- is-carbolic-soap.htm 
4. रिफाइन 
आज से 50 साल पहले तो कोई रिफाइन तेल के बारे में जानता नहीं था, ये पिछले 20 -25 वर्षों से हमारे देश में आया है | कुछ विदेशी कंपनियों और भारतीय कंपनियाँ इस धंधे में लगी हुई हैं | इन्होने चक्कर चलाया और टेलीविजन के माध्यम से जम कर प्रचार किया लेकिन लोगों ने माना नहीं इनकी बात को, तब इन्होने डोक्टरों के माध्यम से कहलवाना शुरू किया | डोक्टरों ने अपने प्रेस्क्रिप्सन में रिफाइन तेल लिखना शुरू किया कि तेल खाना तो सफोला का खाना या सनफ्लावर का खाना, ये नहीं कहते कि तेल, सरसों का खाओ या मूंगफली का खाओ, अब क्यों, आप सब समझदार हैं समझ सकते हैं | 

ये रिफाइन तेल बनता कैसे हैं ? मैंने देखा है और आप भी कभी देख लें तो बात समझ जायेंगे | किसी भी तेल को रिफाइन करने में 6 से  7 केमिकल का प्रयोग किया जाता है और डबल रिफाइन करने में ये संख्या 12 -13 हो जाती है | ये सब केमिकल मनुष्य के द्वारा बनाये हुए हैं प्रयोगशाला में, भगवान का बनाया हुआ एक भी केमिकल इस्तेमाल नहीं होता, भगवान का बनाया मतलब प्रकृति का दिया हुआ जिसे हम ओरगेनिक कहते हैं | तेल को साफ़ करने के लिए जितने केमिकल इस्तेमाल किये जाते हैं सब Inorganic हैं और Inorganic केमिकल ही दुनिया में जहर बनाते हैं और उनका combination जहर के तरफ ही ले जाता है | इसलिए रिफाइन तेल, डबल रिफाइन तेल गलती से भी न खाएं | फिर आप कहेंगे कि, क्या खाएं ? तो आप शुद्ध तेल खाइए, सरसों का, मूंगफली का, तीसी का, या नारियल का | अब आप कहेंगे कि शुद्ध तेल में बास बहुत आती है और दूसरा कि शुद्ध तेल बहुत चिपचिपा होता है | हमलोगों ने जब शुद्ध तेल पर काम किया या एक तरह से कहे कि रिसर्च किया तो हमें पता चला कि तेल का चिपचिपापन उसका सबसे महत्वपूर्ण घटक है | तेल में से जैसे ही चिपचिपापन निकाला जाता है तो पता चला कि ये तो तेल ही नहीं रहा, फिर हमने देखा कि तेल में जो बास आ रही है वो उसका प्रोटीन कंटेंट है, शुद्ध तेल में प्रोटीन बहुत है, दालों में ईश्वर का दिया हुआ प्रोटीन सबसे ज्यादा है, दालों के बाद जो सबसे ज्यादा प्रोटीन है वो तेलों में ही है, तो तेलों में जो बास आप पाते हैं वो उसका Organic content है प्रोटीन के लिए | 4 -5 तरह के प्रोटीन हैं सभी तेलों में, आप जैसे ही तेल की बास निकालेंगे उसका प्रोटीन वाला घटक गायब हो जाता है और चिपचिपापन निकाल दिया तो उसका Fatty Acid गायब | अब ये दोनों ही चीजें निकल गयी तो वो तेल नहीं पानी है, जहर मिला हुआ पानी | और ऐसे रिफाइन तेल के खाने से कई प्रकार की बीमारियाँ होती हैं, घुटने दुखना, कमर दुखना, हड्डियों में दर्द, ये तो छोटी बीमारियाँ हैं, सबसे खतरनाक बीमारी है, हृदयघात (Heart Attack), पैरालिसिस, ब्रेन का डैमेज हो जाना, आदि, आदि | जिन-जिन घरों में पुरे मनोयोग से रिफाइन तेल खाया जाता है उन्ही घरों में ये समस्या आप पाएंगे, अभी तो मैंने देखा है कि जिनके यहाँ रिफाइन तेल इस्तेमाल हो रहा है उन्ही के यहाँ Heart Blockage और Heart Attack की समस्याएं हो रही है | 

जब हमने सफोला का तेल लेबोरेटरी में टेस्ट किया, सूरजमुखी का तेल, अलग-अलग ब्रांड का टेस्ट किया तो AIIMS के भी कई डोक्टरों की रूचि इसमें पैदा हुई तो उन्होंने भी इसपर काम किया और उन डोक्टरों ने जो कुछ भी बताया उसको मैं एक लाइन में बताता हूँ क्योंकि वो रिपोर्ट काफी मोटी है और सब का जिक्र करना मुश्किल है, उन्होंने कहा "तेल में से जैसे ही आप चिपचिपापन निकालेंगे, बास को निकालेंगे तो वो तेल ही नहीं रहता, तेल के सारे महत्वपूर्ण घटक निकल जाते हैं और डबल रिफाइन में कुछ भी नहीं रहता, वो छूँछ बच जाता है, और उसी को हम खा रहे हैं तो तेल के माध्यम से जो कुछ पौष्टिकता हमें मिलनी चाहिए वो मिल नहीं रहा है |" आप बोलेंगे कि तेल के माध्यम से हमें क्या मिल रहा ? मैं बता दूँ कि हमको शुद्ध तेल से मिलता है HDL (High Density Lipoprotin), ये तेलों से ही आता है हमारे शरीर में, वैसे तो ये लीवर में बनता है लेकिन शुद्ध तेल खाएं तब | तो आप शुद्ध तेल खाएं तो आपका HDL अच्छा रहेगा और जीवन भर ह्रदय रोगों की सम्भावना से आप दूर रहेंगे | 

अभी भारत के बाजार में सबसे ज्यादा विदेशी तेल बिक रहा है | मलेशिया नामक एक छोटा सा देश है हमारे पड़ोस में, वहां का एक तेल है जिसे पामोलिन तेल कहा जाता है, हम उसे पाम तेल के नाम से जानते हैं, वो अभी भारत के बाजार में सबसे ज्यादा बिक रहा है, एक-दो टन नहीं, लाखो-करोड़ों टन भारत आ रहा है और अन्य तेलों में मिलावट कर के भारत के बाजार में बेचा जा रहा है | 7 -8 वर्ष पहले भारत में ऐसा कानून था कि पाम तेल किसी दुसरे तेल में मिला के नहीं बेचा जा सकता था लेकिन GATT समझौता और WTO के दबाव में अब कानून ऐसा है कि पाम तेल किसी भी तेल में मिला के बेचा जा सकता है | भारत के बाजार से आप किसी भी नाम का डब्बा बंद तेल ले आइये, रिफाइन तेल और डबल रिफाइन तेल के नाम से जो भी तेल बाजार में मिल रहा है वो पामोलिन तेल है | और जो पाम तेल खायेगा, मैं स्टाम्प पेपर पर लिख कर देने को तैयार हूँ कि वो ह्रदय सम्बन्धी बिमारियों से मरेगा | क्योंकि पाम तेल के बारे में सारी दुनिया के रिसर्च बताते हैं कि पाम तेल में सबसे ज्यादा ट्रांस-फैट है और ट्रांस-फैट वो फैट हैं जो शरीर में कभी dissolve नहीं होते हैं, किसी भी तापमान पर dissolve नहीं होते और ट्रांस फैट जब शरीर में dissolve नहीं होता है तो वो बढ़ता जाता है और तभी हृदयघात होता है, ब्रेन हैमरेज होता है और आदमी पैरालिसिस का शिकार होता है, डाईबिटिज होता है, ब्लड प्रेशर  की शिकायत होती है |      
क्रमशः ......
जय हिंद
राजीव दीक्षित


Monday, April 15, 2013

वन्दे मातरम Vs जन-गण-मन


वन्दे मातरम की कहानी
ये वन्दे मातरम नाम का जो गान है जिसे हम राष्ट्रगीत के रूप में जानते हैं उसे बंकिम चन्द्र चटर्जी ने 7 नवम्बर 1875 को लिखा था | बंकिम चन्द्र चटर्जी बहुत ही क्रन्तिकारी विचारधारा के व्यक्ति थे | देश के साथ-साथ पुरे बंगाल में उस समय अंग्रेजों के खिलाफ जबरदस्त आन्दोलन चल रहा था और एक बार ऐसे ही विरोध आन्दोलन में भाग लेते समय इन्हें बहुत चोट लगी और बहुत से उनके दोस्तों की मृत्यु भी हो गयी | इस एक घटना ने उनके मन में ऐसा गहरा घाव किया कि उन्होंने आजीवन अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का संकल्प ले लिया उन्होंने | बाद में उन्होंने एक उपन्यास लिखा जिसका नाम था "आनंदमठ", जिसमे उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बहुत कुछ लिखा, उन्होंने बताया कि अंग्रेज देश को कैसे लुट रहे हैं, ईस्ट इंडिया कंपनी भारत से कितना पैसा ले के जा रही है, भारत के लोगों को वो कैसे मुर्ख बना रहे हैं, ये सब बातें उन्होंने उस किताब में लिखी | वो उपन्यास उन्होंने जब लिखा तब अंग्रेजी सरकार ने उसे प्रतिबंधित कर दिया | जिस प्रेस में छपने के लिए वो गया वहां अंग्रेजों ने ताला लगवा दिया | तो बंकिम दा ने उस उपन्यास को कई टुकड़ों में बांटा और अलग-अलग जगह उसे छपवाया औए फिर सब को जोड़ के प्रकाशित करवाया | अंग्रेजों ने उन सभी प्रतियों को जलवा दिया फिर छपा और फिर जला दिया गया, ऐसे करते करते सात वर्ष के बाद 1882 में वो ठीक से छ्प के बाजार में आया और उसमे उन्होंने जो कुछ भी लिखा उसने पुरे देश में एक लहर पैदा किया | शुरू में तो ये बंगला में लिखा गया था, उसके बाद ये हिंदी में अनुवादित हुआ और उसके बाद, मराठी, गुजराती और अन्य भारतीय भाषाओँ में ये छपी और वो भारत की ऐसी पुस्तक बन गया जिसे रखना हर क्रन्तिकारी के लिए गौरव की बात हो गयी थी | इसी पुस्तक में उन्होंने जगह जगह वन्दे मातरम का घोष किया है और ये उनकी भावना थी कि लोग भी ऐसा करेंगे | बंकिम बाबु की एक बेटी थी जो ये कहती थी कि आपने इसमें बहुत कठिन शब्द डाले है और ये लोगों को पसंद नहीं आयेगी तो बंकिम बाबु कहते थे कि अभी तुमको शायद समझ में नहीं आ रहा है लेकिन ये गान कुछ दिन में देश के हर जबान पर होगा, लोगों में जज्बा पैदा करेगा और ये एक दिन इस देश का राष्ट्रगान बनेगा | ये गान देश का राष्ट्रगान बना लेकिन ये देखने के लिए बंकिम बाबु जिन्दा नहीं थे लेकिन जो उनकी सोच थी वो बिलकुल सही साबित हुई| 1905 में ये वन्दे मातरम इस देश का राष्ट्रगान बन गया | 1905 में क्या हुआ था कि अंग्रेजों की सरकार ने बंगाल का बटवारा कर दिया था | अंग्रेजों का एक अधिकारी था कर्जन जिसने बंगाल को दो हिस्सों में बाट दिया था, एक पूर्वी बंगाल और एक पश्चिमी बंगाल | इस बटवारे का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये था कि ये धर्म के नाम पर हुआ था, पूर्वी बंगाल मुसलमानों के लिए था और पश्चिमी बंगाल हिन्दुओं के लिए, इसी को हमारे देश में बंग-भंग के नाम से जाना जाता है | ये देश में धर्म के नाम पर पहला बटवारा था उसके पहले कभी भी इस देश में ऐसा नहीं हुआ था, मुसलमान शासकों के समय भी ऐसा नहीं हुआ था | खैर ...............इस बंगाल बटवारे का पुरे देश में जम के विरोध हुआ था , उस समय देश के तीन बड़े क्रांतिकारियों लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पल ने इसका जम के विरोध किया और इस विरोध के लिए उन्होंने वन्दे मातरम को आधार बनाया | और 1905 से हर सभा में, हर कार्यक्रम में ये वन्देमातरम गाया जाने लगा | कार्यक्रम के शुरू में भी और अंत में भी | धीरे धीरे ये इतना प्रचलित हुआ कि अंग्रेज सरकार इस वन्दे मातरम से चिढने लगी | अंग्रेज जहाँ इस गीत को सुनते, बंद करा देते थे और और गाने वालों को जेल में डाल देते थे, इससे भारत के क्रांतिकारियों को और ज्यादा जोश आता था और वो इसे और जोश से गाते थे | एक क्रन्तिकारी थे इस देश में जिनका नाम था खुदीराम बोस, ये पहले क्रन्तिकारी थे जिन्हें सबसे कम उम्र में फाँसी की सजा दी गयी थी | मात्र 14 साल की उम्र में उसे फाँसी के फंदे पर लटकाया गया था और हुआ ये कि जब खुदीराम बोस को फाँसी के फंदे पर लटकाया जा रहा था तो उन्होंने फाँसी के फंदे को अपने गले में वन्दे मातरम कहते हुए पहना था | इस एक घटना ने इस गीत को और लोकप्रिय कर दिया था और इस घटना के बाद जितने भी क्रन्तिकारी हुए उन सब ने जहाँ मौका मिला वहीं ये घोष करना शुरू किया चाहे वो भगत सिंह हों, राजगुरु हों, अशफाकुल्लाह हों, चंद्रशेखर हों सब के जबान पर मंत्र हुआ करता था | ये वन्दे मातरम इतना आगे बढ़ा कि आज इसे देश का बच्चा बच्चा जानता है |

जन-गण-मन की कहानी
 
सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था | सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया | पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये | इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया | रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा | उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे | उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था | और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए | रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है "जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता" | इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था | इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है "भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है | हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो |  तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो !  तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है | तुम्हारी ही हम गाथा गाते है | हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो | "

जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया | जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया | क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है | जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की | वह बहुत खुश हुआ | उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये | रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए | जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था |  उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया | टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है | जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में  गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया |

रविन्द्र नाथ टैगोर की अंग्रेजों के प्रति ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ?  फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और कहा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली | इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया | सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे | रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे | अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये  1919 के बाद की घटना है)  | इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत 'जन गण मन' अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है | इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है | इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है | लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे |  7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये |

1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी | लेकिन वह दो खेमो में बट गई | जिसमे एक खेमे में बाल गंगाधर तिलक के समर्थक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु के समर्थक थे | मतभेद था सरकार बनाने को लेकर | मोती लाल नेहरु वाला गुट चाहता था कि स्वतंत्र भारत की क्या जरूरत है, अंग्रेज तो कोई ख़राब काम कर नहीं रहे है, अगर बहुत जरूरी हुआ तो यहाँ के कुछ लोगों को साथ लेकर अंग्रेज साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने |  जबकि बालगंगाधर तिलक गुट वाले कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है | इस मतभेद के कारण कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए | एक नरम दल और दूसरा गरम दल | गरम दल के नेता हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे |  (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे) | लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे, उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना, हर समय अंग्रेजो से समझौते में रहते थे | वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी |  नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत "जन गण मन" गाया करते थे और गरम दल वाले "वन्दे मातरम" |  नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती  (मूर्ति पूजा) है | उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे, उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया | जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो संविधान सभा की बहस चली | संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई | बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना | और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु | अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास | गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये |  तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया  "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा" | लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए | नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन-गण-मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है | उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन-गण-मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गाया नहीं गया | नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे | जन-गण-मन को इसलिए प्राथमिकता दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था | 


तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का | अब ये आप को तय करना है कि आपको क्या गाना है ? 


इतने लम्बे पत्र को आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद् | और अच्छा लगा हो तो इसे फॉरवर्ड कीजिये, आप अगर और भारतीय भाषाएँ जानते हों तो इसे उस भाषा में अनुवादित कीजिये (अंग्रेजी छोड़ कर), अपने अपने ब्लॉग पर डालिए, मेरा नाम हटाइए अपना नाम डालिए मुझे कोई आपत्ति नहीं है | मतलब बस इतना ही है की ज्ञान का प्रवाह होते रहने दीजिये |
जय हिंद
राजीव दीक्षित 

भारत के काले कानून


भारत में 1857 के पहले ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन हुआ करता था वो अंग्रेजी सरकार का सीधा शासन नहीं था | 1857 में एक क्रांति हुई जिसमे इस देश में मौजूद 99 % अंग्रेजों को भारत के लोगों ने चुन चुन के मार डाला था और 1% इसलिए बच गए क्योंकि उन्होंने अपने को बचाने के लिए अपने शरीर को काला रंग लिया था | लोग इतने गुस्से में थे कि उन्हें जहाँ अंग्रेजों के होने की भनक लगती थी तो वहां पहुँच के वो उन्हें काट डालते थे | हमारे देश के इतिहास की किताबों में उस क्रांति को सिपाही विद्रोह के नाम से पढाया जाता है | Mutiny और Revolution में अंतर होता है लेकिन इस क्रांति को विद्रोह के नाम से ही पढाया गया हमारे इतिहास में | 1857 की गर्मी में मेरठ से शुरू हुई ये क्रांति जिसे सैनिकों ने शुरू किया था, लेकिन एक आम आदमी का आन्दोलन बन गया और इसकी आग पुरे देश में फैली और 1 सितम्बर तक पूरा देश अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हो गया था | भारत अंग्रेजों और अंग्रेजी अत्याचार से पूरी तरह मुक्त हो गया था | लेकिन नवम्बर 1857 में इस देश के कुछ गद्दार रजवाड़ों ने अंग्रेजों को वापस बुलाया और उन्हें इस देश में पुनर्स्थापित करने में हर तरह से योगदान दिया | धन बल, सैनिक बल, खुफिया जानकारी, जो भी सुविधा हो सकती थी उन्होंने दिया और उन्हें इस देश में पुनर्स्थापित किया | और आप इस देश का दुर्भाग्य देखिये कि वो रजवाड़े आज भी भारत की राजनीति में सक्रिय हैं | अंग्रेज जब वापस आये तो उन्होंने क्रांति के उद्गम स्थल बिठुर (जो कानपुर के नजदीक है) पहुँच कर सभी 24000 लोगों का मार दिया चाहे वो नवजात हो या मरणासन्न | बिठुर के ही नाना जी पेशवा थे और इस क्रांति की सारी योजना यहीं बनी थी इसलिए अंग्रेजों ने ये बदला लिया था | उसके बाद उन्होंने अपनी सत्ता को भारत में पुनर्स्थापित किया और जैसे एक सरकार के लिए जरूरी होता है वैसे ही उन्होंने कानून बनाना शुरू किया | अंग्रेजों ने कानून तो 1840 से ही बनाना शुरू किया था और मोटे तौर पर उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया था, लेकिन 1857 से उन्होंने भारत के लिए ऐसे-ऐसे कानून बनाये जो एक सरकार के शासन करने के लिए जरूरी होता है | आप देखेंगे कि हमारे यहाँ जितने कानून हैं वो सब के सब 1857 से लेकर 1946 तक के हैं |
1840 तक का भारत जो था उसका विश्व व्यापार में हिस्सा 33% था, दुनिया के कुल उत्पादन का 43% भारत में पैदा होता था और दुनिया के कुल कमाई में भारत का हिस्सा 27% था | ये अंग्रेजों को बहुत खटकती थी, इसलिए आधिकारिक तौर पर भारत को लुटने के लिए अंग्रेजों ने कुछ कानून बनाये थे और वो कानून अंग्रेजों के संसद में बहस के बाद तैयार हुई थी, उस बहस में ये तय हुआ कि "भारत में होने वाले उत्पादन पर टैक्स लगा दिया जाये क्योंकि सारी दुनिया में सबसे ज्यादा उत्पादन यहीं होता है और ऐसा हम करते हैं तो हमें टैक्स के रूप में बहुत पैसा मिलेगा" | तो अंग्रेजों ने सबसे पहला कानून बनाया Central Excise Duty Act और टैक्स तय किया गया 350% मतलब 100 रूपये का उत्पादन होगा तो 350 रुपया Excise Duty देना होगा | फिर अंग्रेजों ने समान के बेचने पर Sales Tax लगाया और वो तय किया गया 120% मतलब 100 रुपया का माल बेचो तो 120 रुपया CST दो | फिर एक और टैक्स आया Income Tax और वो था 97% मतलब 100 रुपया कमाया तो 97 रुपया अंग्रेजों को दे दो | ऐसे ही Road Tax, Toll Tax, Municipal Corporation tax, Octroi, House Tax, Property Tax लगाया और ऐसे करते-करते 23 प्रकार का टैक्स लगाया अंग्रेजों ने और खूब लुटा इस देश को | 1840 से लेकर 1947 तक टैक्स लगाकर अंग्रेजों ने जो भारत को लुटा उसके सारे रिकार्ड बताते हैं कि करीब 300 लाख करोड़ रुपया लुटा अंग्रेजों ने इस देश से | तो भारत की जो गरीबी आयी है वो लुट में से आयी गरीबी है | विश्व व्यापार में जो हमारी हिस्सेदारी उस समय 33% थी वो घटकर 5% रह गयी, हमारे कारखाने बंद हो गए, लोगों ने खेतों में काम करना बंद कर दिया, हमारे मजदूर बेरोजगार हो गए | इस तरीके से बेरोजगारी पैदा हुई, गरीबी-बेरोजगारी से भुखमरी पैदा हुई और आपने पढ़ा होगा कि हमारे देश में उस समय कई अकाल पड़े, ये अकाल प्राकृतिक नहीं था बल्कि अंग्रेजों के ख़राब कानून से पैदा हुए अकाल थे, और इन कानूनों की वजह से 1840 से लेकर 1947 तक इस देश में साढ़े चार करोड़ लोग भूख से मरे | तो हमारी गरीबी का कारण ऐतिहासिक है कोई प्राकृतिक,अध्यात्मिक या सामाजिक कारण नहीं है |

1857 की क्रांति की बाद अंग्रेजों ने भारत के ही कुछ गद्दार राजाओं के सहयोग से अपनी खोयी सत्ता को पुनर्स्थापित किया और 1 नवम्बर 1858 को भारत में प्रकाशित होने वाले कुछ अंग्रेजो अख़बारों में ब्रिटेन की तत्कालीन महारानी का ये पत्र छपा जिसमे कहा गया था "आज से भारत में कंपनी (ईस्ट इंडिया कंपनी) की सरकार नहीं बल्कि कानून की सरकार की स्थापना होगी"| लेकिन वो कानून कौन बनाएगा ? तो वो कानून अंग्रेजों की संसद बनाएगी, ब्रिटिश पार्लियामेंट बनाएगी और उसके हिसाब से भारत को चलाया जायेगा | अब ब्रिटिश पार्लियामेंट में बहस इस बात को लेकर हुई कि "कानून ऐसे बनाये जाने चाहिए कि भारतवासी कभी भी दुबारा खड़े न हो सकें और अंग्रेजों के खिलाफ बगावत न कर सकें" | इस तरह अंग्रेजों ने हमारे देश में कानून की सरकार बनाई और हमारे देश में अंग्रेजों ने 34735 कानून बनाये शासन करने के लिए, सब का जिक्र करना तो मुश्किल है लेकिन कुछ मुख्य कानूनों के बारे में मैं संक्षेप में लिख रहा हूँ |  
हमेशा की तरह ये लेख भी परम सम्मानीय राजीव दीक्षित भाई के विभिन्न व्याख्यानों में से जोड़ के मैंने बनाया है, उम्मीद है कि आप लोगों के ये पसंद आएगी | 
  •  Licensing of Arms Act -  सबसे पहला कानून जानते हैं क्या आया ? सबसे पहला कानून ? आपको ये जानकार हैरानी होगी | अंग्रेजों के खिलाफ जो बगावत हुई थी वो सशस्त्र बगावत थी, उसमे हथियारों का इस्तेमाल हुआ था तो अंग्रेजों ने सबसे पहला कानून यही बनाया कि  "हथियार वही रख सकेगा जिसके पास लाइसेंस होगा, लाइसेंस जिसके पास नहीं होगा वो हथियार रखने का अधिकारी नहीं होगा", तो अंग्रेजों ने क्या किया ? लाइसेंसिंग ऑफ़ आर्म्स एक्ट नामक पहला कानून बनाया और इस कानून के आधार पर क्या किया गया कि घर-घर की तलाशी ली गयी कि किसके घर में बन्दूक है, किसके घर में चाकू है, किसके घर में छुरा है, किसके घर में हसिया है और वो सब अंग्रेजों ने छीन लिया क्योंकि अंग्रेजों को डर था कि इन्ही हथियारों की मदद से भारतवासी फिर से बगावत कर सकते हैं | और इस कानून के आधार पर जब भारतवासियों के हर्थियर छीन लिए गए तब भारतवासी कमजोर हो गए और वो कमजोरी इतनी भारी पड़ी कि अगले 90 साल तक फिर अंग्रेजों की गुलामी हमको सहन करनी पड़ी | और इस देश का दुर्भाग्य ये कि ये कानून आज भी चल रहा है इस देश में | आपको मालूम है कि इस देश में हथियार वही रख सकता है जिसके पास लाइसेंस होगा और हथियार देने का काम पहले गोरे अंग्रेज करते थे आज लाइसेंस देने का काम काले अंग्रेज कर रहे हैं |     
  • Indian Education Act - 1858 में Indian Education Act बनाया गया | इसकी ड्राफ्टिंग लोर्ड मैकोले ने की थी | लेकिन उसके पहले उसने यहाँ (भारत) के शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण कराया था, उसके पहले भी कई अंग्रेजों ने भारत के शिक्षा व्यवस्था के बारे में अपनी रिपोर्ट दी थी | अंग्रेजों का एक अधिकारी था G.W.Litnar और दूसरा था Thomas Munro, दोनों ने अलग अलग इलाकों का अलग-अलग समय सर्वे किया था | 1823 के आसपास की बात है ये | Litnar , जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा है कि यहाँ 97% साक्षरता है और Munro, जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा कि यहाँ तो 100 % साक्षरता है, और उस समय जब भारत में इतनी साक्षरता है | और मैकोले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा  के लिए अगर गुलाम बनाना है तो इसकी देशी और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे, और मैकोले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा है "कि जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी " | इसलिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को  गैरकानूनी घोषित किया, जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता जो समाज के तरफ से होती थी वो गैरकानूनी हो गयी, फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया, और इस देश के गुरुकुलों को घूम घूम कर ख़त्म कर दिया उनमे आग लगा दी, उसमे पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा-पीटा, जेल में डाला | 1850 तक इस देश में 7 लाख 32 हजार गुरुकुल हुआ करते थे और उस समय इस देश में गाँव थे 7 लाख 50 हजार, मतलब हर गाँव में औसतन एक गुरुकुल और ये जो गुरुकुल होते थे वो सब के सब आज की भाषा में Higher Learning Institute हुआ करते थे उन सबमे 18 विषय पढाया जाता था, और ये गुरुकुल समाज के लोग मिल के चलाते थे न कि राजा, महाराजा, और इन गुरुकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी | इस तरह से सारे गुरुकुलों को ख़त्म किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया और कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे फ्री स्कूल कहा जाता था, इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के ज़माने के यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं | और मैकोले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है वो, उसमे वो लिखता है कि "इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी " और उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है |  और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रोब पड़ेगा, अरे हम तो खुद में हीन हो गए हैं जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा | लोगों का तर्क है कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है, दुनिया में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है | शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है | इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे | ईशा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी | अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी, समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी |  संयुक्त राष्ट संघ जो अमेरिका में है वहां की भाषा अंग्रेजी नहीं है, वहां का सारा काम फ्रेंच में होता है | जो समाज अपनी मातृभाषा से कट जाता है उसका कभी भला नहीं होता और यही मैकोले की रणनीति थी |
  • Indian Police Act - 10 मई 1857 को जब देश में क्रांति हो गई और भारतवासियों ने पूरे देश में 3 लाख अंग्रेजो को मार डाला । उस समय क्रांतिकारी थे मंगल पांडे, तात्या टोपे, नाना साहब पेशवा आदि । लेकिन कुछ गद्दार राजाओ के वजह से अंग्रेज दुबारा भारत में वापिस आयें । तब उन्होने फ़ैसला किया कि अब हम भारतवासियों को सीधे मारे पीटेंगे नहीं, अब हम इनको कानून बना कर गुलाम रखेंगे ।भारतवासी कभी भी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत न कर सके इसके लिए भारतवासियों को दबाने-कुचलने के लिए एक ऐसा तंत्र चाहिए जो ये काम बखूबी कर सके तो पुलिस नाम की एक व्यवस्था उन्होंने खड़ी की | क्या आपको मालूम है कि 1858 के पहले इस देश में पुलिस नाम की कोई व्यस्था नहीं हुआ करती थी? भारत के किसी भी राजा ने पुलिस व्यवस्था नहीं रखी थी, सैनिक और सेना था लेकिन पुलिस नहीं होती थी, क्योंकि पुलिस की जरूरत नहीं होती थी, अपने ही लोगों को मारना, पीटना और धमकाना ये कौन करता है ? तो 1860 में इंडियन पुलिस एक्ट बनाया गया | 1857 के पहले अंग्रेजों की कोई पुलिस नहीं थी इस देश में लेकिन 1857 में जो विद्रोह हुआ उससे डरकर उन्होंने ये कानून बनाया ताकि ऐसे किसी विद्रोह/क्रांति को दबाया जा सके | अंग्रेजों ने इसे बनाया था भारतीयों का दमन और अत्याचार करने के लिए, उनको डर था कि 1857 जैसी क्रंति दुबारा न हो जाये, तब अंग्रेजो ने इंडियन पुलिस एक्ट बनाया, और पुलिस बनायी, उस पुलिस को विशेष अधिकार दिया गया | उसमे एक धारा बनाई गई right to offence की, मतलब पुलिस वाला आप पर जितनी मर्जी लाठियां मारे पर आप कुछ नहीं कर सकते और अगर आपने लाठी पकड़ने की कोशिश की तो आप पर मुकद्दमा चलेगा और इसी कानून के आधार पर सरकार अंदोलन करने वालो पर लाठियां बरसाया करती थी, फ़िर धारा 144 बनाई गई ताकि लोग इकठे न हो सके और बेचारे पुलिस की हालत देखिये कि ये 24 घंटे के कर्मचारी हैं उतने ही तनख्वाह में, तनख्वाह मिलती है 8 घंटे की और ड्यूटी रहती है 24 घंटे की | जब साईमन कमीशन भारत आने वाला था तो क्रान्तिकारी लाला लाजपत राय जी उसका शंतिप्रिय विद्रोह कर रहे थे । अंग्रेजी पुलिस के एक अफ़सर सांडर्स ने उन पर लाठिया बरसानी शुरु कर दी । एक लाठी मारी, दो मारी, तीन, चार, पांच, करते करते 14 लाठिया मारी । नतीजा ये हुआ लाला जी के सर से खून ही खून बहने लगा, उनको अस्तपताल ले जाया गया जहाँ उनकी मृत्यु हो गई । अब सांडर्स को सज़ा मिलनी चाहिए, इसके लिये शहीदेआजम भगत सिंह ने अदालत में मुकदमा कर दिया, सुनवाई हुई और अदालत ने फैसला दिया कि लाला जी पर जो लाठिया मारी गई है वो कानून के आधार पर मारी गई है अब इसमे उनकी मौत हो गई तो हम क्या करे इसमे कुछ भी गलत नहीं है, क्योंकि सांडर्स अपनी ड्यूटी कर रहा था,  नतीजा सांडर्स को बाइज्जत बरी किया जाता है ।
    तब भगत सिंह को गुस्सा आया उसने कहा जिस अंग्रेजी न्याय व्यवस्था ने लाला जी के हत्यारे को बाईज्जत बरी कर दिया, उसको सज़ा मैं दुंगा और इसे वहीं पहुँचाउगा जहाँ इसने लाला जी को पहुँचाया है और जैसा आप सब जानते हैं कि फ़िर भगत सिंह ने सांडर्स को गोली से उड़ा दिया और फ़िर भगत सिंह को इसके लिये फ़ांसी की सज़ा हुई । जिंदगी के अंतिम दिनो में जब भगत सिंह लाहौर जेल में बंद थे तो बहुत से पत्रकार उनसे मिलने जाया करते थे और उसी बातचीत में किसी पत्रकार ने भगत सिंह से उनकी आख़िरी इच्छा पूछी । शहीदे आजम भगत सिंह ने कहा कि " मैं देश के नौजवानो से उम्मीद करता हूँ कि जिस
     
    इंडियन पुलिस एक्ट के कारण लाला जी की जान गई, जिस इंडियन पुलिस एक्ट के आधार पर मैं फ़ांसी चढ़ रहा हूँ, इस देश के नौजवान आजादी मिलने से पहले पहले इसको खत्म करवा देगें, यही मेरे दिल की इच्छा है ।"
    लेकिन ये बहुत शर्म की बात है कि आजादी के 64 साल के बाद आज भी इस कानून को हम खत्म नहीं करवा पाये । आज भी आप देखिये कि उसी इंडियन पुलिस एक्ट के आधार पर पुलिस देशवासियो पर कितना जूल्म करती है । कभी आन्दोलन करने वाले किसानों को डंडे मारती है,  कभी औरत को डंडे मारती है और सैकड़ों लोग उसमे घायल होते हैं । हम हर साल 23 मार्च को भगत सिंह का शहीदी दिवस मानाते हैं । लाला लाजपत राय का शहीदी दिवस मानाते हैं । किस मुँह से हम उनको श्रद्धांजलि अर्पित करे कि "लाला लाजपत राय जी जिस कानून के आधार आपको लाठिया मारी गई और आपकी मौत हुई उस कानून को हम आजादी के 64 साल बाद भी हम खत्म नहीं करवा पाये, किस मुँह से हम भगत सिंह को श्रद्धांजलि दे कि भगत सिंह जी जिस अंग्रेजी कानून के आधार पर आपको फाँसी की सज़ा हुई, आजादी के 64 साल बाद भी हम उसको सिर पर ढो रहे हैं ।" आजादी के 64 साल बाद आज भी पुलिस आन्दोलन करने वाले भारतवासियो को वैसे ही डंडे मारे जैसे अंग्रेजो की पुलिस मारती तो थी तो हम कैसे कहें कि हम आजाद हो गए हैं ?
  • Indian Civil Services Act - 1860 में ही इंडियन सिविल सर्विसेस एक्ट बनाया गया | ये जो Collector हैं वो इसी कानून की देन हैं | भारत के Civil Servant जो हैं उन्हें Constitutional Protection है, क्योंकि जब ये कानून बना था उस समय सारे ICS अधिकारी अंग्रेज थे और उन्होंने अपने बचाव के लिए ऐसा कानून बनाया था, ऐसा विश्व के किसी देश में नहीं है, और वो कानून चुकी आज भी लागू है इसलिए भारत के IAS अधिकारी सबसे निरंकुश हैं | अभी आपने CVC थोमस का मामला देखा होगा | इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता | और इन अधिकारियों का हर तीन साल पर तबादला हो जाता था क्योंकि अंग्रेजों को ये डर था कि अगर ज्यादा दिन तक कोई अधिकारी एक जगह रह गया तो उसके स्थानीय लोगों से अच्छे सम्बन्ध हो जायेंगे और वो ड्यूटी उतनी तत्परता से नहीं कर पायेगा या उसके काम काज में ढीलापन आ जायेगा | और वो ट्रान्सफर और पोस्टिंग का सिलसिला आज भी वैसे ही जारी है और हमारे यहाँ के कलक्टरों की जिंदगी इसी में कट जाती है | और ये जो Collector होते थे उनका काम था Revenue, Tax, लगान और लुट के माल को Collect करना इसीलिए ये Collector कहलाये और जो Commissioner होते थे वो commission पर काम करते थे उनकी कोई तनख्वाह तय नहीं होती थी और वो जो लुटते थे उसी के आधार पर उनका कमीशन होता था | ये मजाक की बात या बनावटी कहानी नहीं है ये सच्चाई है इसलिए ये दोनों पदाधिकारी जम के लूटपाट और अत्याचार मचाते थे उस समय | अब इस कानून का नाम Indian Civil Services Act से बदल कर Indian Civil Administrative Act हो गया है, 64 सालों में बस इतना ही बदलाव हुआ है  | 
  • Indian Income Tax Act - इस एक्ट पर जब ब्रिटिश संसद में चर्चा हो रही थी तो एक सदस्य ने कहा कि "ये तो बड़ा confusing है, कुछ भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा है",  तो दुसरे ने कहा कि हाँ इसे जानबूझ कर ऐसा रखा गया है ताकि जब भी भारत के लोगों को कोई दिक्कत हो तो वो हमसे ही संपर्क करें | आज भी भारत के आम आदमी को छोडिये, इनकम टैक्स के वकील भी इसके नियमों को लेकर दुविधा की स्थिति में रहते हैं | और इनकम टैक्स की दर रखी गयी 97% यानि 100 रुपया कमाओ तो 97 रुपया टैक्स में दे दो और उसी समय ब्रिटेन से आने वाले सामानों पर हर तरीके के टैक्स की छुट दी जाती है ताकि ब्रिटेन के माल इस देश के गाँव-गाँव में पहुँच सके | और इसी चर्चा में एक सांसद कहता है कि "हमारे तो दोनों हाथों में लड्डू है, अगर भारत के लोग इतना टैक्स देते हैं तो वो बर्बाद हो जायेंगे या टैक्स की चोरी करते हैं तो बेईमान हो जायेंगे और अगर बेईमान हो गए तो हमारी गुलामी में आ जायेंगे और अगर बरबाद हुए तो हमारी गुलामी में आने ही वाले है" | तो ध्यान दीजिये कि इस देश में टैक्स का कानून क्यों लाया जा रहा है ? क्योंकि इस देश के व्यापारियों को, पूंजीपतियों को, उत्पादकों को, उद्योगपतियों को, काम करने वालों को या तो बेईमान बनाया जाये या फिर बर्बाद कर दिया जाये, ईमानदारी से काम करें तो ख़त्म हो जाएँ और अगर बेईमानी करें तो हमेशा ब्रिटिश सरकार के अधीन रहें | अंग्रेजों ने इनकम टैक्स की दर रखी थी 97% और इस व्यवस्था को 1947 में ख़त्म हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ और आपको जान के ये आश्चर्य होगा कि 1970-71 तक इस देश में इनकम टैक्स की दर 97% ही हुआ करती थी | और इसी देश में भगवान श्रीराम जब अपने भाई भरत से संवाद कर रहे हैं तो उनसे कह रहे है कि प्रजा पर ज्यादा टैक्स नहीं लगाया जाना चाहिए और चाणक्य ने भी कहा है कि टैक्स ज्यादा नहीं होना चाहिए नहीं तो प्रजा हमेशा गरीब रहेगी, अगर सरकार की आमदनी बढ़ानी है तो लोगों का उत्पादन और व्यापार बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करो | अंग्रेजों ने तो 23 प्रकार के टैक्स लगाये थे उस समय इस देश को लुटने के लिए, अब तो इस देश में VAT को मिला के 64 प्रकार के टैक्स हो गए हैं | महात्मा गाँधी के देश में नमक पर भी टैक्स हो गया है और नमक भी विदेशी कंपनियां बेंच रही हैं, आज अगर गाँधी जी की आत्मा स्वर्ग से ये देखती होगी तो आठ-आठ आंसू रोती होगी कि जिस देश में मैंने नमक सत्याग्रह किया कि विदेशी कंपनी का नमक न खाया जाये आज उस देश में लोग विदेश कंपनी का नमक खरीद रहे हैं और नमक पर टैक्स लगाया जा रहा है | शायद हमको मालूम नहीं है कि हम कितना बड़ा National Crime कर रहे हैं |  
  • Indian Forest Act - 1865 में Indian Forest Act बनाया गया और ये लागू हुआ 1872 में | इस कानून के बनने के पहले जंगल गाँव की सम्पति माने जाते थे और गाँव के लोगों की सामूहिक हिस्सेदारी होती थी इन जंगलों में, वो ही इसकी देखभाल किया करते थे, इनके संरक्षण के लिए हर तरह का उपाय करते थे, नए पेड़ लगाते थे और इन्ही जंगलों से जलावन की लकड़ी इस्तेमाल कर के वो खाना बनाते थे | अंग्रेजों ने इस कानून को लागू कर के जंगल के लकड़ी के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया | साधारण आदमी अपने घर का खाना बनाने के लिए लकड़ी नहीं काट सकता और अगर काटे तो वो अपराध है और उसे जेल हो जाएगी, अंग्रेजों ने इस कानून में ये प्रावधान किया कि भारत का कोई भी आदिवासी या दूसरा कोई भी नागरिक पेड़ नहीं काट सकता और आम लोगों को लकड़ी काटने से रोकने के लिए उन्होंने एक पोस्ट बनाया District Forest Officer जो उन लोगों को तत्काल सजा दे सके, उसपर केस करे, उसको मारे-पीटे | लेकिन दूसरी तरफ जंगलों के लकड़ी की कटाई के लिए ठेकेदारी प्रथा लागू की गयी जो आज भी लागू है और कोई ठेकेदार जंगल के जंगल साफ़ कर दे तो कोई फर्क नहीं पड़ता |  अंग्रेजों द्वारा नियुक्त ठेकेदार जब चाहे, जितनी चाहे लकड़ी काट सकते हैं | हमारे देश में एक अमेरिकी कंपनी है जो वर्षों से ये काम कर रही है, उसका नाम है ITC पूरा नाम है Indian Tobacco Company इसका असली नाम है American Tobacco Company, और ये कंपनी हर साल 200 अरब सिगरेट बनाती है और इसके लिए 14 करोड़ पेड़ हर साल काटती है | इस कंपनी के किसी अधिकारी या कर्मचारी को आज तक जेल की सजा नहीं हुई क्योंकि ये इंडियन फोरेस्ट एक्ट ऐसा है जिसमे सरकार के द्वारा अधिकृत ठेकेदार तो पेड़ काट सकते हैं लेकिन आप और हम चूल्हा जलाने के लिए, रोटी बनाने के लिए लकड़ी नहीं ले सकते और उससे भी ज्यादा ख़राब स्थिति अब हो गयी है, आप अपने जमीन पर के पेड़ भी नहीं काट सकते | तो कानून ऐसे बने हुए हैं कि साधारण आदमी को आप जितनी प्रताड़ना दे सकते हैं, दुःख दे सकते है, दे दो विशेष आदमी को आप छू भीं नहीं सकते | और जंगलों की कटाई से घाटा ये हुआ कि मिटटी बह-बह के नदियों में आ गयी और नदियों की गहराई को इसने कम कर दिया और बाढ़ का प्रकोप बढ़ता गया | 
  • Indian Penal Code - अंग्रेजों ने एक कानून हमारे देश में लागू किया था जिसका नाम है Indian Penal Code (IPC ) | ये Indian Penal Code अंग्रेजों के एक और गुलाम देश Ireland के Irish Penal Code की फोटोकॉपी है, वहां भी ये IPC ही है लेकिन Ireland में जहाँ "I" का मतलब Irish है वहीं भारत में इस "I" का मतलब Indian है, इन दोनों IPC में बस इतना ही अंतर है बाकि कौमा और फुल स्टॉप का भी अंतर नहीं है | अंग्रेजों का एक अधिकारी था टी.वी.मैकोले, उसका कहना था कि भारत को हमेशा के लिए गुलाम बनाना है तो इसके शिक्षा तंत्र और न्याय व्यवस्था को पूरी तरह से समाप्त करना होगा | और आपने अभी ऊपर Indian Education Act पढ़ा होगा, वो भी मैकोले ने ही बनाया था और उसी मैकोले ने इस IPC की भी ड्राफ्टिंग की थी | ये बनी 1840 में और भारत में लागू हुई 1860 में | ड्राफ्टिंग करते समय मैकोले ने एक पत्र भेजा था ब्रिटिश संसद को जिसमे उसने लिखा था कि "मैंने भारत की न्याय व्यवस्था को आधार देने के लिए एक ऐसा कानून बना दिया है जिसके लागू होने पर भारत के किसी आदमी को न्याय नहीं मिल पायेगा | इस कानून की जटिलताएं इतनी है कि भारत का साधारण आदमी तो इसे समझ ही नहीं सकेगा और जिन भारतीयों के लिए ये कानून बनाया गया है उन्हें ही ये सबसे ज्यादा तकलीफ देगी | और भारत की जो प्राचीन और परंपरागत न्याय व्यवस्था है उसे जडमूल से समाप्त कर देगा"| और वो आगे लिखता है कि " जब भारत के लोगों को न्याय नहीं मिलेगा तभी हमारा राज मजबूती से भारत पर स्थापित होगा" | ये हमारी न्याय व्यवस्था अंग्रेजों के इसी IPC के आधार पर चल रही है | और आजादी के 64 साल बाद हमारी न्याय व्यवस्था का हाल देखिये कि लगभग 4 करोड़ मुक़दमे अलग-अलग अदालतों में पेंडिंग हैं, उनके फैसले नहीं हो पा रहे हैं | 10 करोड़ से ज्यादा लोग न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं लेकिन न्याय मिलने की दूर-दूर तक सम्भावना नजर नहीं आ रही है, कारण क्या है ? कारण यही IPC है | IPC का आधार ही ऐसा है | और मैकोले ने लिखा था कि "भारत के लोगों के मुकदमों का फैसला होगा, न्याय नहीं मिलेगा" | मुक़दमे का निपटारा होना अलग बात है, केस का डिसीजन आना अलग बात है, केस का जजमेंट आना अलग बात है और न्याय मिलना बिलकुल अलग बात है | अब इतनी साफ़ बात जिस मैकोले ने IPC के बारे में लिखी हो उस IPC को भारत की संसद ने 64 साल बाद भी नहीं बदला है और ना कभी कोशिश ही की है |   
  •  Land Acquisition Act - एक अंग्रेज आया इस देश में उसका नाम था डलहौजी | ब्रिटिश पार्लियामेंट ने उसे एक ही काम के लिए भारत भेजा था कि तुम जाओ और भारत के किसानों के पास जितनी जमीन है उसे छिनकर अंग्रेजों के हवाले करो | डलहौजी ने इस "जमीन को हड़पने के कानून" को भारत में लागू करवाया, इस कानून को लागू कर के किसानों से जमीने छिनी गयी | जो जमीन किसानों की थी वो ईस्ट इंडिया कंपनी की हो गयी | डलहौजी ने अपनी डायरी में लिखा है कि " मैं गाँव गाँव जाता था और अदालतें लगवाता था और लोगों से जमीन के कागज मांगता था" | और आप जानते हैं कि हमारे यहाँ किसी के पास उस समय जमीन के कागज नहीं होते थे क्योंकि ये हमारे यहाँ परंपरा से चला आ रहा था या आज भी है कि पिता की जमीन या जायदाद बेटे की हो जाती है, बेटे की जमीन उसके बेटे की हो जाती है | सब जबानी होता था, जबान की कीमत होती थी या आज भी है आप देखते होंगे कि हमारे यहाँ जो शादियाँ होती हैं वो सिर्फ और सिर्फ जबानी समझौते से होती है कोई लिखित समझौता नहीं होता है, एक दिन /तारीख तय हो जाती है और लड़की और लड़का दोनों पक्ष शादी की तैयारी में लग जाते है लड़के वाले निर्धारित तिथि को बारात ले के लड़की वालों के यहाँ पहुँच जाते है, शादी हो जाती है | तो कागज तो किसी के पास था नहीं इसलिए सब की जमीनें उस अत्याचारी डलहौजी ने हड़प ली | एक दिन में पच्चीस-पच्चीस हजार किसानों से जमीनें छिनी गयी | परिणाम क्या हुआ कि इस देश के करोड़ों किसान भूमिहीन हो गए | डलहौजी के आने के पहले इस देश का किसान भूमिहीन नहीं था, एक-एक किसान के पास कम से कम 10 एकड़ जमीन थी, ये अंग्रेजों के रिकॉर्ड बताते हैं | डलहौजी ने आकर इस देश के 20 करोड़ किसानों को भूमिहीन बना दिया और वो जमीने अंग्रेजी सरकार की हो गयीं | 1947 की आजादी के बाद ये कानून ख़त्म होना चाहिए था लेकिन नहीं, इस देश में ये कानून आज भी चल रहा है | हम आज भी अपनी खुद की जमीन पर मात्र किरायेदार हैं, अगर सरकार का मन हुआ कि आपके जमीन से हो के रोड निकाला जाये तो आपको एक नोटिस दी जाएगी और आपको कुछ पैसा दे के आपकी घर और जमीन ले ली जाएगी | आज भी इस देश में किसानों की जमीन छिनी जा रही है बस अंतर इतना ही है कि पहले जो काम अंग्रेज सरकार करती थी वो काम आज भारत सरकार करती है | पहले जमीन छीन कर अंग्रेजों के अधिकारी अंग्रेज सरकार को वो जमीनें भेंट करते थे, अब भारत सरकार वो जमीनें छिनकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भेंट कर रही है और Special Economic Zone उन्हीं जमीनों पर बनाये जा रहे हैं और ये जमीन बहुत बेदर्दी से लिए जा रहे हैं | भारतीय या बहुराष्ट्रीय कंपनी को कोई जमीन पसंद आ गयी तो सरकार एक नोटिस देकर वो जमीन किसानों से ले लेती है और वही जमीन वो कंपनी वाले महंगे दाम पर दूसरों को बेचते हैं | जिसकी जमीन है उसके हाँ या ना का प्रश्न ही नहीं है, जमीन की कीमत और मुआवजा सरकार तय करती है, जमीन वाले नहीं | एक पार्टी की सरकार वहां पर है तो दूसरी पार्टी का नेता वहां पहुँच के घडियाली आंसू बहाता है और दूसरी पार्टी की सरकार है तो पहले वाला पहुँच के घडियाली आंसू बहाता है लेकिन दोनों पार्टियाँ मिल के इस कानून को ख़त्म करने की कवायद नहीं करते और 1894 का ये अंग्रेजों का कानून बिना किसी परेशानी के इस देश में आज भी चल रहा है | इसी देश में नंदीग्राम होते हैं, इसी देश में सिंगुर होते हैं और अब नोएडा हो रहा है | जहाँ लोग नहीं चाहते कि हम हमारी जमीन छोड़े, वहां लाठियां चलती हैं, गोलियां चलती है | आपको लगता है कि ये देश आजाद हो गया है ? मुझे तो नहीं लगता | 
  • Indian Citizenship Act - अंग्रेजों ने एक कानून लाया था Indian Citizenship Act, आप और हम भारत के नागरिक हैं तो कैसे हैं, उसके Terms और Condition अंग्रेज तय कर के गए हैं | अंग्रेजों ने ये कानून इसलिए बनाया था कि अंग्रेज भी इस देश के नागरिक हो सकें | तो इसलिए इस कानून में ऐसा प्रावधान है कि कोई व्यक्ति  (पुरुष या महिला) एक खास अवधि तक इस देश में रह ले तो उसे भारत की नागरिकता मिल सकती है (जैसे बंगलादेशी शरणार्थी) | लेकिन हमने इसमें आज 2011 तक के 64 सालों में रत्ती भर का भी संशोधन नहीं किया | इस कानून के अनुसार कोई भी विदेशी आकर भारत का नागरिक हो सकता है, नागरिक हो सकता है तो चुनाव लड़ सकता है, और चुनाव लड़ सकता है तो विधायक और सांसद भी हो सकता है, और विधायक और सांसद बन सकता है तो मंत्री भी बन सकता है, मंत्री बन सकता है तो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी बन सकता है | ये भारत की आजादी का माखौल नहीं तो और क्या है ? दुनिया के किसी भी देश में ये व्यवस्था नहीं है | आप अमेरिका जायेंगे और रहना शुरू करेंगे तो आपको ग्रीन कार्ड मिलेगा लेकिन आप अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं बन सकते, जब तक आपका जन्म अमेरिका में नहीं हुआ होगा | ऐसा ही कनाडा में है, ब्रिटेन में है, फ़्रांस में है, जर्मनी में है | दुनिया में 204 देश हैं लेकिन दो-तीन देश को छोड़ के हर देश में ये कानून है कि आप जब तक उस देश में पैदा नहीं हुए तब तक आप किसी संवैधानिक पद पर नहीं बैठ सकते, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है | कोई भी विदेशी इस देश की नागरिकता ले सकता है और इस देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन हो सकता है और आप उसे रोक नहीं सकते, क्योंकि कानून है, Indian Citizenship Act , उसमे ये व्यवस्था है | ये अंग्रेजों के समय का कानून है, हम उसी को चला रहे हैं, उसी को ढो रहे हैं आज भी, आजादी के 64 साल बाद भी | आप समझते हैं कि हमारी एकता और अखंडता सुरक्षित रहेगी ? 
  • Indian Advocates Act - हमारे देश में जो अंग्रेज जज होते थे वो काला टोपा लगाते थे और उसपर नकली बालों का विग लगाते थे | ये व्यवस्था आजादी के 40-50 साल बाद तक चलता रहा था | हमारे यहाँ वकीलों का जो ड्रेस कोड है वो इसी कानून के आधार पर है, काला कोट, उजला शर्ट और बो ये हैं वकीलों का ड्रेस कोड | काला कोट जो होता है वो आप जानते हैं कि गर्मी को सोखता है, और अन्दर की गर्मी को बाहर नहीं निकलने देता, और इंग्लैंड में चुकी साल में 8-9 महीने भयंकर ठण्ड पड़ती है तो उन्होंने ऐसा ड्रेस अपनाया, अब हम भारत में भी ऐसा ही ड्रेस पहन रहे हैं ये समझ से बाहर की बात है | हमारे यहाँ का मौसम गर्म है और साल में नौ महीने तो बहुत गर्मी रहती है और अप्रैल से अगस्त तक तो तापमान 40-50 डिग्री तक हो जाता है फिर ऐसे ड्रेस को पहनने से क्या फायदा जो शरीर को कष्ट दे, कोई और रंग भी तो हम चुन सकते थे काला रंग की जगह, लेकिन नहीं | हमारे देश में आजादी के पहले के जो वकील हुआ करते थे वो ज्यादा हिम्मत वाले थे | लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक हमेशा मराठी पगड़ी पहन कर अदालत में बहस करते थे और गाँधी जी ने कभी काला कोट नहीं पहना और इसके लिए कई बार उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ा था, लेकिन उन लोगों ने कभी समझौता नहीं किया |
  • Indian Motor Vehicle Act - उस ज़माने में कार/मोटर जो था वो सिर्फ अंग्रेजों, रजवाड़ों और पैसे वालों के पास होता था तो इस कानून में प्रावधान डाला गया कि अगर किसी को मोटर से धक्का लगे या धक्के से मौत हो जाये तो सजा नहीं होनी चाहिए या हो भी तो कम से कम | साल डेढ़ साल की सजा हो ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए उसको हत्या नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि हत्या में तो धारा 302 लग जाएगी और वहां हो जाएगी फाँसी या आजीवन कारावास, तो अंग्रेजों ने इस एक्ट में ये प्रावधान रखा कि अगर कोई (अंग्रेजों के) मोटर के नीचे दब के मरा तो उसे कठोर और लम्बी सजा ना मिले | ये व्यवस्था आज भी जारी है और इसीलिए मोटर के धक्के से होने वाली मौत में किसी को सजा नहीं होती | और सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस देश में हर साल डेढ़ लाख लोग गाड़ियों के धक्के से या उसके नीचे आ के मरते हैं लेकिन आज तक किसी को फाँसी या आजीवन कारावास नहीं हुआ | 
  • Indian Agricultural Price Commission Act - ये भी अंग्रेजों के ज़माने का कानून है | पहले ये होता था कि किसान, जो फसल उगाते थे तो उनको ले के मंडियों में बेचने जाते थे और अपने लागत के हिसाब से उसका दाम तय करते थे | अंग्रेजों ने हमारे कृषि व्यवस्था को ख़त्म करने के लिए ये कानून लाया और किसानों को उनके फसल का दाम तय करने का अधिकार समाप्त कर दिया | अंग्रेज अधिकारी मंडियों में जाते थे और वो किसानों के फसल का मूल्य तय करते थे कि आज ये अनाज इस मूल्य में बिकेगा और ये अनाज इस मूल्य में बिकेगा, ऐसे ही हर अनाज का दाम वो तय करते थे | आप हर साल समाचारों में सुनते होंगे कि "सरकार ने गेंहू का,धान का, खरीफ का, रबी का समर्थन मूल्य तय किया" | ये किसानों के फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य होता है, मतलब किसानों के फसलों का आधिकारिक मूल्य होता है | इससे ज्यादा आपके फसल का दाम नहीं होगा | किसानों को अपने उपजाए अनाजों का दाम तय करने का अधिकार आज भी नहीं है इस आजाद भारत में | उनका मूल्य तय करना सरकार के हाथ में होता है | और आज दिल्ली के AC Room में बैठ कर वो लोग किसानों के फसलों का दाम तय करते हैं जिन्होंने खेतों में कभी पसीना नहीं बहाया और जो खेतों में पसीना बहाते हैं, वो अपने उत्पाद का दाम नहीं तय कर सकते |  
  • Indian Patent Act - अंग्रेजों ने एक कानून लाया Patent Act , और वो बना था 1911 | Patent मतलब होता है एक तरह का Legal Right, कोई व्यक्ति, वैज्ञानिक या कंपनी अगर किसी चीज का आविष्कार करती है तो उसे उस आविष्कार पर एक खास अवधि के लिए अधिकार दिया जाता है | ये जा के 1970 में ख़त्म हुआ श्रीमती इंदिरा गाँधी के प्रयासों से लेकिन इसे अब फिर से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में बदल दिया गया है | अभी विस्तार से नहीं लिखूंगा मतलब इस देश के लोगों के हित से ज्यादा जरूरी है बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हित |
  • Indian Evidence Act - Indian Evidence Act काम करता है गवाह और सबूत के आधार पर और ये दोनों ही बदले जा सकते हैं | गवाह भी बदले जा सकते हैं और सबूत तो इतने आसानी से मिटाए जाते हैं और नए बनाये जाते हैं इस देश में कि आप कल्पना नहीं कर सकते हैं | इसी कारण से, चूकी गवाह बदले जाते हैं, गवाह कैसे बदलते हैं, पता है आपको ? पुलिस बयान लेती है और अदालत में जैसे ही वो गवाह खड़ा होता है, तुरंत मुकर जाता है और कहता है कि पुलिस ने जबरदस्ती ये बयान मुझसे लिया है और जैसे ही वो ये कहता है, वो मुक़दमा, जो 20 मिनट में ख़त्म हो जाता, 10 साल तक चलता रहता है | और यही कारण है कि अंग्रेजी न्याय व्यवस्था में conviction rate  पाँच प्रतिशत है | Conviction Rate समझते हैं आप ? 100 लोगों के ऊपर मुक़दमा किया जाये तो सिर्फ पाँच लोगों को ही सजा होती है, 95 को सजा होती ही नहीं, वो अदालत से बाइज्जत बरी हो जाते हैं | तो इसका मतलब है कि या तो 95 मुकदमे झूठे, या सरकार झूठी, या पुलिस व्यवस्था झूठी या न्याय व्यवस्था कमजोर | ये इंडियन एविडेंस एक्ट ने ऐसा सत्यानाश कर रखा है इस देश का कि सत्य महत्व का नहीं है बल्कि गवाह और सबूत महत्व का है, कई बार पुलिस कहती है कि सत्य हमें मालूम है लेकिन गवाह नहीं, सबूत नहीं है, क्या करे हम ? ना सजा दिलवा सकते हैं, ना किसी को न्याय दिलवा सकते हैं | और न्यायाधीश को सत्य की पहचान करने के लिए बिठाया जाता है, वो न्यायाधीश भी सबूत और गवाह के आधार पर सत्य की तलाश करता है, जब कि सच्चाई ये है कि सत्य अपने आप में ही पूर्ण होता है, उसको कोई गवाह की जरूरत नहीं होती है, उसको कोई सबूत की जरूरत नहीं होती | इस इंडियन एविडेंस एक्ट या कहें भारतीय न्याय व्यवस्था का कैसा मजाक इस देश में हो रहा है उसका एक उदाहरण देता हूँ | 26 नवम्बर को जिन आतंकवादियों ने पाकिस्तान से आकर मुंबई में सैकड़ों निर्दोष लोगों को मार दिया | उनमे से एक पकड़ा गया और उसके ऊपर नौटंकी चली कि नहीं | हम सब को सत्य मालूम है कि इसने सैकड़ों लोगों को मारा, इस मामले में निर्णय देना 10 मिनट का काम था, अब उस पर सबूत ढूंढे गए, गवाह ढूंढे गए और वो मक्कार आतंकवादी मजाक बना रहा है, हँस रहा है | भारतीय न्याय व्यवस्था पर हँस रहा है और दुर्भाग्य से ये हमारी न्याय व्यवस्था नहीं है, ये अंग्रेजों की है |            
ये हैं भारत के विचित्र कानून, सब पर लिखना संभव नहीं है और ज्यादा बोझिल न हो जाये इसलिए यहीं विराम देता हूँ | इन कानूनों के किताब बाज़ार में उपलब्ध हैं लेकिन मैंने इनके इतिहास को वर्तमान के साथ जोड़ के आपके सामने प्रस्तुत किया है, और इन कानूनों का इतिहास, उन पर हुई चर्चा को ब्रिटेन के संसद House of Commons की library से लिया गया हैं | अब कुछ छोटे-छोटे कानूनों की चर्चा करता हूँ |
  • अंग्रेजों ने एक कानून बनाया था कि गाय को, बैल को, भैंस को डंडे से मारोगे तो जेल होगी लेकिन उसे गर्दन से काट कर उसका माँस निकल कर बेचोगे तो गोल्ड मेडल मिलेगा क्योंकि आप Export Income बढ़ा रहे हैं | ये कानून अंग्रेजों ने हमारी कृषि व्यवस्था को बर्बाद करने के लिए लाया था | लेकिन आज भी भारत में हजारों कत्लखाने गायों को काटने के लिए चल रहे हैं | 
  • 1935 में अंग्रेजों ने एक कानून बनाया था उसका नाम था Government of India Act , ये अंग्रेजों ने भारत को 1000 साल गुलाम बनाने के लिए बनाया था और यही कानून हमारे संविधान का आधार बना | 
  • 1939 में राशन कार्ड का कानून बनाया गया क्योंकि उसी साल द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ और अंग्रेजों को धन के साथ-साथ भोजन की भी आवश्यकता थी तो उन्होंने भारत से धन भी लिया और अनाज भी लिया और इसी समय राशन कार्ड की शुरुआत की गयी | और जिनके पास राशन कार्ड होता था उन्हें सस्ते दाम पर अनाज मिलता था और जिनके पास राशन कार्ड होता था उन्हें ही वोट देने का अधिकार था | और अंग्रेजों ने उस द्वितीय विश्वयुद्ध में 1732 करोड़ स्टर्लिंग पोंड का कर्ज लिया था भारत से जो आज भी उन्होंने नहीं चुकाया है और ना ही किसी भारतीय सरकार ने उनसे ये मांगने की हिम्मत की पिछले 64 सालों में | 
  • अंग्रेजों को यहाँ से चीनी की आपूर्ति होती थी | और भारत के लोग चीनी के बजाय गुड (Jaggary) बनाना पसंद करते थे और गन्ना चीनी मीलों को नहीं देते थे | तो अंग्रेजों ने गन्ना उत्पादक इलाकों में गुड बनाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया और गुड बनाना गैरकानूनी घोषित कर दिया था और वो काननों आज भी इस देश में चल रहा है | 
  • पहले गाँव का विकास गाँव के लोगों के जिम्मे होता था और वही लोग इसकी योजना बनाते थे | किसी गाँव की क्या आवश्यकता है, ये उस गाँव के रहने वालों से बेहतर कौन जान सकता है लेकिन गाँव के उस व्यवस्था को तोड़ने के लिए अंग्रेजों ने PWD की स्थापना की | वो PWD आज भी है | NGO भी इसीलिए लाया गया था, ये भी अंग्रेजों ने ही शुरू किया था |  
  •  हमारे देश में सीमेंट नहीं होता था बल्कि चुना और दूध को मिला कर जो लेप तैयार होता था उसी से ईंटों को जोड़ा जाता था | अंग्रेजों ने अपने देश का सीमेंट बेचने के लिए 1850 में इस कला को प्रतिबंधित कर दिया और सीमेंट को भारत के बाजार में उतारा | हमारे देश के किलों (Forts) को आप देखते होंगे सब के सब इसी भारतीय विधि से खड़े हुए थे और आज भी कई सौ सालों से खड़े हैं | और सीमेंट से बने घरों की अधिकतम उम्र होती है 100 साल और चुने से बने घरों की न्यूनतम उम्र होती है 500 साल |  
  • आप दक्षिण भारत में भव्य मंदिरों की एक परमपरा देखते होंगे, इन मंदिरों को पेरियार जाती के लोग बनाते थे आज की भाषा में वो सब के सब सिविल इंजिनियर थे, बहुत अद्भुत मंदिरों का निर्माण किया उन्होंने | एक अंग्रेज अधिकारी था A.O.Hume, इसी ने 1885 में कांग्रेस की स्थापना की थी, जब ये 1890 में मद्रास प्रेसिडेंसी में अधिकारी बन के गया तो इसने वहां इस जाति को मंदिरों के निर्माण करने से प्रतिबंधित कर दिया, गैरकानूनी घोषित कर दिया | नतीजा क्या हुआ कि वो भव्य मंदिरों की परंपरा तो ख़त्म हुई ही साथ ही साथ वो सभी कारीगर बेरोजगार हो गए और हमारी एक भवन निर्माण कला समाप्त हो गयी | वो कानून आज भी है |
  • उड़ीसा में नहर के माध्यम से खेतों में पानी तब छोड़ा जाता था जब उसकी जरूरत नहीं होती थी और जब जरूरत होती थी यानि गर्मियों में तो उस समय नहरों में पानी नहीं दिया जाता था | आप भारत के पूर्वी इलाकों को देखते होंगे, जिसमे शामिल हैं पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड और उड़ीसा, ये इलाके पिछड़े हुए हैं | कभी आपने सोचा है कि ये इलाके क्यों पिछड़े हुए हैं ? जब कि भारत के 90% Minerals इसी इलाके में होते हैं | ये सब अंग्रेजों की गलत नीतियों की वजह से है और हमारे केंद्र की सरकार ने कभी ये प्रयास नहीं किया कि ऐसा क्यों है | 
  • एक कानून के हिसाब से बच्चे को पेट में मारोगे तो Abhortion और पैदा होने पर मारोगे तो हत्या | Abhortion हुआ तो कुछ नहीं लेकिन उसे पैदा होने के बाद मारा तो हत्या का मामला बनेगा | (भारत स्वाभिमान इस भ्रूण हत्या को धारा 302 के तहत लाना चाहता है |)
  • जेल मैनुअल के अनुसार आपको पुरे कपडे उतारने पड़ेंगे आपकी बॉडी मार्क दिखाने के लिए भले ही आपका बॉडी मार्क आपके चेहरे पर क्यों न हो | क्योंकि कपडे उतरवाने के पीछे का मकसद ये था कि आपका (मतलब भारत के लोगों का) कदम-कदम पर अपमान किया जाये, नीचा दिखाया जाये | और जेल के कैदियों को अल्युमिनियम के बर्तन में खाना दिया जाता था ताकि वो जल्दी मरे, वो अल्युमिनियम के बर्तन में खाना देना आज भी जारी हैं हमारे जेलों में, क्योंकि वो अंग्रेजों के इस कानून में है |
  • अंग्रेजों ने सेना के लिए कानून बनाया था | इसके सैनिकों को मूंछ (mustache) रखने पर अतिरिक्त भत्ता मिलता था | सेना में आज भी मूंछ रखने पर उसके देख रेख और maintenance के लिए भत्ता मिलता है |   
  • आपमें से बहुतों ने क़ुतुब मीनार के पास एक लोहे का स्तम्भ देखा होगा जो सैकड़ों साल से खुले में है लेकिन आज तक उसमे जंग (Rust) नहीं लगा है | ये स्टील बनाने की जो कला थी वो हमारे देश के आदिवासियों के पास थी जो कि आज के झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और ओड़िसा के इलाकों में रहते थे और वो कच्चा लोहा वहीं के खदानों से निकाल के लाते थे और इस तरीके के उन्नत किस्म का लोहा बनाते थे | आज दुनिया में इतनी उच्च तकनीक होने के बावजूद ऐसा लोहा कोई देश नहीं बना पाया है जिस पर जंग न लगे | तो अंग्रेजों ने इस तकनीक को बर्बाद करने के लिए एक कानून बनाया कि कोई भी आदिवासी खदानों से कच्चे लोहे नहीं निकालेगा, और कोई ऐसा करते हुए पकड़ा गया तो उसे 40 कोड़े पड़ेंगे और अगर फिर भी बच गया तो उसको गोली मार दी जाएगी | इस तरह से ये तकनीक इस देश में अंग्रेजों ने ख़त्म की | और वो कानून आज भी चल रहा है और ध्यान दीजियेगा कि इन्ही इलाकों में माओवाद और नक्सलवाद चल रहा है |
अजीब अजीब कानून है इस देश में | आप ध्यान देंगे कि अंग्रेजों ने जो भी कानून बनाया था उससे वे भारत के अर्थव्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था को ख़त्म करना चाहते थे और ख़त्म भी किया था, मैं कहना ये चाहता हूँ कि अंग्रेजों ने जो भी कानून बनाये थे वो अपने फायदे और हमारे नुकसान के लिए था और हमें आजादी के बाद इसे ख़त्म कर देना चाहिए था लेकिन अंग्रेजों के गुलामी की एक भी निशानी को हमने 64 सालों में मिटाया नहीं | सब को संभाल के और सहेज के रखा है और हर साल अपने को मुर्ख बनाने के लिए 15 अगस्त और 26 जनवरी को झंडा फहराते है, स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस मनाते हैं | स्वतंत्रता का मतलब होता है अपना तंत्र/अपनी व्यवस्था | ये स्वतंत्रता है या परतंत्रता ? हमने अपना कौन सा तंत्र विकसित किया है इन 64 सालों में ? सब तो अंग्रेजों का ही है | अगर झंडा फहराना ही स्वतंत्रता है तो भीकाजी कामा ने बहुत पहले तिरंगा फहरा दिया था तो क्या हम आजाद हो गए थे | स्वतंत्रता का मतलब है अपनी व्यवस्था जिसमे आप गुलामी की एक एक निशानी को, एक एक व्यवस्था को उखाड़ फेंकते हैं, उन सब चीजों को अपने समाज से हटाते हैं जिससे गुलामी आयी थी, वो तो हम नहीं कर पाए हैं, इसलिए मैं मानता हूँ कि आजादी अधूरी है, इस अधूरी आजादी को पूर्ण आजादी में बदलना है, अपनी व्यवस्था लानी है, स्वराज्य लाना है, इसके लिए आपको और हमको ही आगे आना होगा | गुलामी के कानूनों को ही अगर हमारी संसद आगे बढाती जाये और चलाती जाये इसके लिए संसद नहीं बनाई हमने और इसके लिए चुनाव नहीं होते और करोडो रूपये खर्च नहीं किये जाते | हमने हमारी अपनी व्यवस्थाओं को चलाने के लिए संसद बनाई है | ये जो गुलामी की व्यवस्था आजादी के 64 साल बाद भी चल रही है तो उसे तो ख़त्म करना ही पड़ेगा | आज नहीं तो कल किसी को तो ये सवाल करना ही होगा | भारत की राजनितिक पार्टियाँ ये सवाल नहीं उठाती है, ये मंदिर-मस्जिद के सवाल उठाती हैं और हमको उसी में उलझाये रखती है, इन कानूनों को जो गुलामी की निशानी है उनका सवाल नहीं उठती हैं | समाज को बाँट देने वाले जितने प्रश्न है वो ये उठाती हैं लेकिन गुलामी वाले कानूनों के सवाल नहीं उठाती हैं |

यकीन मानिये हमारे देश की आजादी की लड़ाई के समय जितने भी देशभक्त शहीद हुए, जैसे खुदीराम बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकुल्लाह, वीर सावरकर, सुभाष चन्द्र बोस, उधम सिंह आदि आदि, ये तो कुछ नाम हैं ऐसे 7 लाख से ऊपर देशभक्त थे, उन सब की आत्मा आज भी भटक रही होगी, और वो आपस में एक दुसरे से यही सवाल कर रहे होंगे कि हम कितने मुर्ख थे जो ऐसे देश के लिए जान दिए | या तो वो मुर्ख थे या फिर हम महामूर्ख हैं जो इन सब व्यवस्थाओं को सहेज के और संभाल के रखे हुए हैं |

हमारे सारे दुखों का कारण ये व्यवस्था है जब हम इस व्यवस्था को हटायेंगे तभी हमें सुख की प्राप्ति होगी | जिस देश में धर्मग्रन्थ गीता की रचना हुई और जिसमे कर्म करने को कहा गया और कर्म की प्रधानता बताई गयी, उसी देश के लोग भाग्यवादी हो गए | भाग्य के भरोसे बैठने से कुछ नहीं होगा, उठिए, जागिये और इस व्यवस्था को बदलिए क्योंकि दुःख हमें है नेताओं को नहीं |
जय हिंद 
राजीव दीक्षित

वैश्वीकरण और भारत (Globalisation and Bharat)


मैं स्पष्ट कर दूँ कि मैं अर्थशास्त्र का विद्यार्थी कभी नहीं रहा लेकिन एक आम आदमी के तौर पर इस वैश्वीकरण के बारे में मेरी जो समझ बनी है उसे आपको बताने की कोशिश करूँगा | भाषा आसान रहेगी ताकि किसी को समझने में परेशानी न हो | एक बात और कि इस लेख में जो आंकड़े हैं वो 1991 से लेकर 1997 तक के हैं, ऐसा इसलिए है कि इसी दौर में सबसे ज्यादा हल्ला मचाया गया था इस Globalisation /वैश्वीकरण का  |

1991 के वर्ष से इस देश में Globalisation शुरू हुआ और इसका बहुत शोर भी मचाया गया | भारत से पहले साउथ ईस्ट एशिया में ये उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण (Globalisation, Liberalization, Privatization ) आदि शुरू किया गया था, उसके पहले ये उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण लैटिन अमेरिका और सोवियत संघ में भी शुरू किया गया था | ये उदारीकरण/ वैश्वीकरण का जो पॅकेज या प्रेस्क्रिप्सन है वो अगर कोई देश अपने अंतर्ज्ञान से तैयार करें तो बात समझ में आती है लेकिन ये पॅकेज dictated होता है वर्ल्ड  बैंक और IMF द्वारा | मुझे कभी-कभी हँसी आती है  कि 1991 के पहले हम ग्लोबल नहीं थे और 1991 के बाद हम ग्लोबल हो गए | खैर, ये जो वर्ल्ड बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का प्रेस्क्रिसन होता है वो हर तरह के मरीज (देश) के लिए एक ही होता है | उनके प्रेस्क्रिप्सन में सब मरीजों के लिए समान इलाज होता है, जैसे....
 

  • पहले वो कहते हैं कि आप अपने मुद्रा का अवमूल्यन कीजिये |
  • उसके बाद कहते हैं कि इम्पोर्ट ड्यूटी ख़त्म कीजिये |
  • उसके बाद कहते हैं कि Social Expenditure कम करते-करते इसको ख़त्म कीजिये, क्योंकि उनका कहना है कि सरकार को Social Expenditure से कोई मतलब नहीं होता है |
उसके बाद विदेशी पूंजी निवेशकों के लिए दरवाजा खोल दिया गया | उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण के कुछ तर्क हैं, जैसे .......
  • पहला तर्क है कि भारत को पूंजी की बहुत जरूरत है और जब तक विदेशी पूंजी निवेश नहीं होगा, FDI (Foreign Direct Investment)  नहीं आएगा तो देश का भला नहीं होगा |
  • इस देश में तकनीक की बहुत कमी है और वो तभी आएगा जब आप अपना दरवाजा विदेशी पूंजी निवेश के लिए खोलेंगे |
  • आपके देश का एक्सपोर्ट कम है, जब तक आप बहुराष्ट्रीय कंपनियों को नहीं बुलाएँगे तब तक आपका निर्यात नहीं बढेगा |
  • आप उनको खुल कर खेलने की छुट दीजिये, उनपर कोई पाबन्दी मत लगाइए |
  • यहाँ भारत में बहुत बेरोजगारी है, विदेशी कंपनियां आएँगी तो वो यहाँ रोजगार पैदा करेंगी, वगैरह, वगैरह |
अब मैं इस अवधि में पूंजी निवेश के आंकड़ों के ऊपर आता हूँ, 1991 से लेकर जून 1997 तक कितना विदेशी पूंजी निवेश हुआ भारत में ? जब ये प्रश्न किया गया लोकसभा में तो इस प्रश्न के जवाब में लोकसभा में सरकार का कहना था कि हमने जो विभिन्न MoU sign किये हैं इस अवधि में वो 94 हजार करोड़ का है | ये जवाब बहुत भ्रामक था, तो फिर इस प्रश्न को थोडा specific बना के पूछा गया कि Actual inflow कितना है इस अवधि में ? MoU तो आपने sign किये 94 हजार करोड़ के, लेकिन असल पूंजी आयी कितनी है ? तो पता चला कि उन्नीस हजार सात सौ करोड़ का असल निवेश हुआ है और ये डाटा रूपये में हैं न कि डौलर में | और ये मेरा जवाब नहीं है, वित्त मंत्री का लोकसभा में दिया हुआ जवाब है ये | और ये पूंजी आयी कितने सालों में है, तो 1991 से 1997 के बीच में, मतलब छः सालों में | मतलब इतना हल्ला मचाने के बाद आया क्या तो उन्नीस हजार सात सौ करोड़ | यानि प्रति वर्ष लगभग तीन, सवा तीन हजार करोड़ रुपया आया | और जो निवेश हुआ उसमे ज्यादा कैपिटल मार्केट में हुआ निवेश था, ये Financial capital से किसी देश में उत्पादकता नहीं बढ़ता, Financial capital से किसी देश में कारखाने नहीं खुलते, Financial capital से किसी देश में उत्पादन नहीं बढ़ता, Financial capital से कोई रोजगार पैदा नहीं होता, Financial capital से कभी अर्थव्यवस्था में कोई असर नहीं पड़ता | Financial capital तो आता है शेयर मार्केट में शेयरों का दाम बढ़ाने के लिए | और शेयर मार्केट में जो निवेश होता है वो स्थाई नहीं होता है, आज वो भारत में है, कल उसे पाकिस्तान में फायदा दिखेगा तो वहां चला जायेगा, परसों सिंगापूर चला जायेगा |     

और इसी दौरान हमारे देश के लोगों का बचत कितना था तो वित्त मंत्री का ही कहना था कि हमारे GDP का 24% बचत है भारत के लोगों के द्वारा | मतलब, लगभग 2 लाख करोड़ रुपया बचत था हमारा प्रतिवर्ष जब हमारी GDP 8 लाख करोड़ रूपये की थी |  जिस देश की नेट सेविंग इतनी ज्यादा हो उस देश को विदेशी पूंजी निवेश की जरूरत क्या है ? मतलब हम हर साल 2 लाख करोड़ रूपये बचत करते थे उस अवधि में घरेलु बचत के रूप में, और छः साल में आया मात्र 20 हजार करोड़ रुपया या हर साल तीन, सवा तीन हजार करोड़ रूपये और ढोल पीट-पीट कर हल्ला हो रहा था कि देश में उदारीकरण हो रहा है, वैश्वीकरण हो रहा है | किसको बेवकूफ बना रहे हैं आप |
 

विदेशी पूँजी आती है तो वो आपके फायदे के लिए नहीं आती है वो उनके फायदे के लिए आती है और दुनिया में कोई देश ऐसा नहीं है जो आपके फायदे के लिए अपनी पूँजी आपके देश में लगाये | एक तो सच्चाई ये है कि 1980 से यूरोपियन और अमरीकी बाजार में भयंकर मंदी है और जितना मैं अर्थशास्त्र जानता हूँ उसके अनुसार उनको पूँजी की जरूरत है, अपनी मंदी दूर करने के लिए ना कि वो यहाँ पूँजी ले कर आयेंगे | ये छोटी सी बात समझ में आनी चाहिए और अमेरिका और यूरोप वाले इतने दयावान और साधू-महात्मा नहीं हो गए कि अपना घाटा सह कर भारत का भला करने आयेंगे | इतने भले वो ना थे और ना भविष्य में होंगे | और दुसरे हिस्से की बात कीजिये, मतलब 1991 -1997 तक विदेशी पूंजी आयी 20 हजार करोड़ लेकिन इसी अवधि में हमारे यहाँ से कितनी पूंजी चली गयी विदेश ? तो पता चला कि इसी अवधि में हमारे यहाँ से 34 हजार करोड़ रूपये विदेश चले गए | 20 हजार करोड़ रुपया आया और 34 हजार करोड़ रुपया चला गया तो ये बताइए कि कौन किसको पूंजी दे रहा है |

दुनिया में एक South South Commission है जो गुट निरपेक्ष देशों (NAM) के लिए बनाया गया था 1986 में | और 1986 से 1989 तक डॉक्टर मनमोहन सिंह इस South South Commission के सेक्रेटरी जेनेरल थे | उनकी वेबसाइट पर आज भी मनमोहन सिंह को ही सेक्रेटरी जेनरल बताया जाता है, और भारत के वित्त मंत्री बनने के पहले भारत के तीन-तीन सरकारों के वित्तीय सलाहकार रह चुके थे, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रह चुके थे, दुनिया में उनकी एक अर्थशास्त्री के रूप में खासी इज्ज़त है |  जब डॉक्टर मनमोहन सिंह इस South South Commission के सेक्रेटरी जेनरल थे तो इन्होने एक केस स्टडी किया था, उस में उन्होंने दुनिया के 17 गरीब देशों के आंकड़े दिए थे जिसमे भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, म्यांमार, इंडोनेशिया वगैरह शामिल थे | ये अध्ययन इस विषय पर था कि 1986 से 1989 के बीच में इन गरीब देशों में अमीर देशों से कितनी पूंजी आयी है और इन गरीब देशों से अमीर देशों में कितनी पूंजी चली गयी है, तो उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इन 17 देशों में 1986 से 1989 तक 215 Billion Dollars की पूंजी आयी जिसमे FDI ,Foreign Loan , Foreign Assistance और Foreign Aid शामिल है और जो चली गयी वो राशि है 345 Billion Dollars | अब जो आदमी एक अर्थशास्त्री के रूप में अपने केस स्टडी में ये कह रहा है कि विदेशों से पूंजी आती नहीं बल्कि पूंजी यहाँ से चली जाती है और जब इस देश का वित्त मंत्री बनता है तो 180 डिग्री पर घूम के उलटी बात करता है, ये समझ में नहीं आता | ऐसा क्यों हुआ, इसको समझिये ......
 

मई 1991 में फ्रांस के एक अख़बार La Monde में ये खबर छपी थी कि "हमारे विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि भारत में जो भी सरकार बने मनमोहन सिंह भारत के अगले वित्त मंत्री होंगे" | यहाँ मैं ये स्पष्ट कर दूँ कि उस समय हमारे देश में चुनाव की प्रक्रिया चल रही थी चुनाव संपन्न नहीं हुए थे और राजीव गाँधी जिन्दा थे | ये मनमोहन सिंह, और मोंटेक सिंह अहलुवालिया वर्ल्ड बैंक के बैठाये हुए आदमी थे और अब प्रधानमंत्री कैसे बने हैं आप समझ सकते हैं | आप लोगों को याद होगा कि एक बार मनमोहन सिंह वित्त मंत्री के पोस्ट से इस्तीफा दिए थे लेकिन वो इस्तीफा वर्ल्ड बैंक के दबाव में मंजूर नहीं किया गया था | वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह मात्र एक रुपया और पच्चीस पैसा टोकन मनी के तौर पर लेते थे | अब कौन वित्त मंत्री बनता है, कौन प्रधान मंत्री बनता है इससे मतलब नहीं है, लेकिन महत्वपूर्ण ये है कि हमारी राजनैतिक संप्रुभता को क्या हो गया है कि अमेरिका, यूरोप और वर्ल्ड बैंक तय कर रहा है कि वित्त मंत्री कौन होगा, प्रधानमंत्री कौन होगा | और जब वर्ल्ड बैंक या अमेरिका अपना आदमी आपके यहाँ बैठायेगा तो काम भी अपने लिए ही करवाएगा और वही मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलुवालिया और उनके बाद चिदंबरम ने किया है | FDI, Foreign Loan, Foreign Assistance और Foreign Aid का खूब हल्ला मचाया गया लेकिन हुआ क्या ? भारत और गरीब हो गया | उस समय मनमोहन सिंह और उनके साथ-साथ भारत के अखबार चिल्ला चिल्ला कर इंडोनेशिया, थाईलैंड  और दक्षिण कोरिया को Asian Tigers कहते थे और जब इंडोनेशिया, थाईलैंड  और दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था धराशायी हो गयी तो इनकी बोलती बंद हो गयी | और अभी वालमार्ट को लाने का निर्णय कर लिया है तो उसे भी लायेंगे ही, अभी वो रुक गए है तो सिर्फ इसलिए कि पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले है | और इसीलिए ये लोग महंगाई बढ़ने पर इनके दिल में दर्द नहीं होता बल्कि खुश होते हैं, मोंटेक सिंह, मनमोहन सिंह, प्रणव मुख़र्जी और सारे मंत्रिमंडल के बयान पढ़ लीजियेगा |
 

फिर से मैं उसी वैश्वीकरण पर आता हूँ ........और इसी दौरान जब इस देश में वैश्वीकरण के नाम पर उन्नीस हजार सात सौ करोड़ रूपये का निवेश हुआ, हमारे देश में शेयर मार्केट के माध्यम से 70 हजार करोड़ रूपये की खुले-आम डकैती हो गयी और हमने FIR तक दर्ज नहीं कराई | शेयर मार्केट का वो घोटाला हर्षद मेहता स्कैम के नाम से हम सब भारतीय जाने हैं, लेकिन ये जान लीजिये कि हर्षद मेहता तो महज एक मोहरा था, असल खिलाडी तो अमेरिका का सिटी बैंक था और ये मैं नहीं कह रहा, रामनिवास मिर्धा की अध्यक्षता में गठित Joint Parliamentary Committee का ये कहना था, और रामनिवास मिर्धा कमिटी का कहना था कि जितनी जल्दी हो सके इस देश से सिटी बैंक का बोरिया-बिस्तर समेटिये और इसको भगाइए, लेकिन भारत सरकार की हिम्मत नहीं हुई कि सिटी बैंक पर कोई कार्यवाही करे और सिटी बैंक को छोड़ दिया गया और हमारा 70 हजार करोड़ रुपया डूब गया | 
 

आपने ध्यान दिया होगा या आप अगर याद करेंगे तो पाएंगे कि उस globalization के समय (1991 -1997 ) भारत में कई बदलाव हुए थे जैसे ....
 
  • शेयर बाज़ार बहुत तेजी से बढ़ा और बहुत से लोगों ने उस दौर में शेयर में पैसा लगाया था और कुछ लोगों ने पैसा भी बनाया लेकिन ज्यादा मध्य वर्ग के लोग बर्बाद हुए | और market manipulation और media management कैसे किया जाता है ये थोडा सा दिमाग लगायेंगे तो आपको पता लग जायेगा |
  • Satellite Television Channel आना शुरू हुए, हमारे मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि प्रचार दिखा कर दिमाग में बकवास भरने के लिए और आपको याद होगा कि दूरदर्शन के दिनों में हम बिना ब्रेक के सीरियल और फिल्म देखा करते थे | लुभावने प्रचार दिखा-दिखा कर भारत के लोगों को प्रेरित करने की कोशिश की गयी ताकि हम बचत पर नहीं खरीदारी पर ध्यान दे और ज्यादा से ज्यादा पैसा बाज़ार में आये और वो पैसा विदेशों में जाये |
  • बैंकों ने बचत पर इंटेरेस्ट रेट कम कर दिया ताकि लोग बैंक में पैसा जमा नहीं कर के खरीदारी करे, पैसा बाज़ार में इन्वेस्ट करें | क़र्ज़ लेने पर इंटेरेस्ट रेट बढ़ा दिया गया |
  • इसी दौर में कई city developer और builder पैदा हुए जो घर और फ्लैट का सपना दिखा कर लोगों का पैसा बाहर निकालना शुरू किये और अगर पैसा नहीं है तो बैंकों ने होम लोन का सपना दिखाना शुरू किया | 
  • बैंकों के मार्फ़त हाऊसिंग लोन और कार लोन को बढ़ावा दिया गया, ताकि लोग कर्ज लेकर गाड़ी और घर खरीदें |  
इन सब के पीछे एक ही मकसद था कि पैसा ज्यादा से ज्यादा बाहर निकले, बचत की भावना कम हो लेकिन भारतीय संस्कृति ऐसी है जहाँ लोग निवेश भी करते हैं तो बचत करने के बाद | अमेरिका और भारत में ये मूल अंतर है जो समझना होगा | हमारे देश में ऐसे ही एक महात्मा हुए थे जिनका नाम था "चारवाक" और उनका कहना था यावत् जीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत, .........अर्थात जब तक जियो सुख से जियो और जरूरत पड़े तो कर्ज लेकर भी घी पियो मतलब मौज मस्ती करो........ और ये भारत का उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण भी हमें यही सिखाता है |

भारत के बुद्धिजीवियों द्वारा विदेशी निवेश को लेकर भारत में भ्रम फैलाया जाता है, तो मैं आपको बता दूँ कि विदेशी कम्पनियाँ आज भी निवेश नहीं करती है, क्योंकि उनके पास निवेश करने के लिए कुछ भी नहीं है | यूरोप और अमेरिका के बाजारों में 1980 से मंदी चल रही है और ये मंदी इतना जबरदस्त है कि खुद उनको अपनी मंदी दूर करने के लिए पूँजी की जरूरत है | जब कोई कंपनी निवेश करती है तो उनका जो Initial paid -up capital होता है उसका सिर्फ 5% ही वो लेकर आती हैं और बाकी 95% पूँजी वो यहीं के बाजार से उठाती हैं, बैंक लोन के रूप में और अपने शेयर बाजार में उतार कर | इसलिए उनके निवेश पर भरोसा करना दुनिया की सबसे बड़ी बेवकूफी है | एक बात को दिमाग में बैठा लीजिये कि कोई भी देश, विदेशी पूँजी निवेश से विकास नहीं करता चाहे वो जापान हो या चीन | जापान और चीन ने भी अपने घरेलु बचत बढ़ाये थे, तब वो कुछ कर सके | हमारी सालाना घरेलु बचत जब 2 लाख करोड़ की है तो हमें विदेशी पूँजी निवेश की जरूरत कहाँ है ? और उन्होंने 6 -7 सालों में जो 20 हजार करोड़ का निवेश किया उसके बदले में हमने कितना गवाँ दिया इसकी चर्चा ये बुद्धिजीवी कभी नहीं करते |
 

बुद्धिजीवियों का ये भी तर्क है कि वैश्वीकरण से हमारा निर्यात बढ़ा है और आयात कम हुआ है | उसे भी समझ लीजिये, ऐसा इसलिए दिखता है क्यों कि हमारे रूपये का अवमूल्यन बहुत हो गया है, जब वैश्वीकरण इस देश में शुरू हुआ तो हमारे 17 -18 रूपये में एक डौलर मिलता था और आज 2011 के अंत में ये लगभग 55 रूपये हो गया है | इसको उदाहरण से समझ लीजिये, अभी कुछ महीने पहले एक डौलर की कीमत 44 रूपये थी तो 11 रूपये प्रतिकिलो के हिसाब से हमने 4 किलो प्याज निर्यात किया तो हमें एक डौलर मिला, अब उसी एक डौलर को पाने के लिए आज हमें 11 रूपये प्रति किलो के हिसाब से 5 किलो प्याज देना होगा, जब एक डौलर की कीमत 55 रूपये हो गयी है | समझ रहे हैं आप ? मतलब हमारा volume of export तो बढ़ा लेकिन आया एक ही डौलर, तो नुकसान किसका हो रहा है ? हमारी निर्यात से होने वाली आय ख़त्म होती जा रही है और जितना निर्यात नहीं बढ़ रहा है उससे ज्यादा आयात बढ़ रहा है, नहीं तो हमारा व्यापार घाटा (trade deficit ) इतना क्यों है ? 1991 के बजट में भारत सरकार का 3000 करोड़ का व्यापार घाटा था और 1997 में ये 18000 करोड़ का हो गया | अगर हमारा निर्यात बढ़ रहा है तो फिर ये व्यापार घाटा क्यों है ? विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी कितनी है ये भी जान लीजिये, आंकड़े तो मेरे पास हर वर्ष के हैं,  लेकिन मैं उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण के दौर की ही बात करूँगा, 1990 में हमारी विश्व व्यापार में हिस्सेदारी थी 0.05%, 1991 में ये हो गया 0.045%, 1992 में ये हो गया 0.042%, 1993 में ये हो गया 0.041%, 1994 में ये हो गया 0.038% और ये घटते-घटते आज 2011 में लगभग आधा प्रतिशत रह गया है | हमारी कितनी बड़ी हिस्सेदारी है विश्व व्यापार में कि हम निर्यात के पीछे पड़े हैं ? 


हमारे यहाँ Export Oriented Growth का मंत्र बुद्धिजीवियों द्वारा जपा जाता है, जब कि हमारे जैसे विकासशील देशों को Export Oriented Growth के चक्कर में पड़ना ही नहीं चाहिए | हमको development oriented growth पर ध्यान देना चाहिए, Growth oriented Export करना होगा, नीतियाँ बदलनी होगी हमें | अभी क्या है कि हम export oriented growth में फंसे हैं | मैं कहना ये चाहता हूँ कि growth oriented export कीजिये, तो इसके लिए पहले उत्पादन बढाइये, मतलब उत्पादन को भारत में इतना surplus कीजिये कि आपके पास निर्यात करने के लिए अलग से बचे, हम तो अपने trade को ख़त्म करते जा रहे हैं, market को ख़त्म करते जा रहे हैं, मतलब trading activity धीरे-धीरे ख़त्म होती जा रही है | आपके पास बचा क्या है निर्यात करने के लिए जो आप निर्यात करेंगे ?

और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बारे में भ्रम फैलाया जाता है कि उनके आने से बाजार में प्रतियोगिता होती है | सच्चाई ये है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ कभी प्रतियोगिता नहीं करती हैं बल्कि प्रतियोगियों को उखाड़ फेंकती हैं | पेप्सी और कोका कोला को देखिये, इनके आने के पहले भारत में थम्स-अप, कैम्पा कोला, गोल्ड स्पोट, लिम्का, आदि ब्रांड थे लेकिन पेप्सी और कोका कोला के आने के बाद या तो इन्होने इनका अपने में विलय कर लिया या ये बंद हो गयी | ऐसे अलग-अलग क्षेत्रों में कई उदहारण हैं | तो ये भ्रम दिमाग से निकालना होगा, उनके आने से competition नहीं monopoly होती है |
 

ये उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण हो रहा है तो किसको ध्यान में रखकर तो जवाब है बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ध्यान में रखकर, देश की आबादी के 70 प्रतिशत किसानों को ध्यान में रखकर ये होता तो समझ में भी आता | भारत का किसान अपना गेंहू और कपास लेकर एक प्रदेश से दुसरे प्रदेश में बेंच नहीं सकता लेकिन अमेरिका की कारगिल कंपनी उसी गेंहू को भारत के किसी भी गाँव में बेच देगी क्योंकि उसे अधिकार मिला हुआ है | पहले हमें अपने देश के अन्दर Liberalization करना होगा | पहले हमें घरेलु या आतंरिक उदारीकरण (Internal Liberalization) करना होगा और उसको 10-15 साल चलाना होगा | यही नीति जापान ने चलाई, यही नीति चीन ने चलाई, यही नीति अमेरिका ने चलाया, यही नीति फ़्रांस ने चलाया | मैं कहना ये चाहता हूँ कि अच्छी बातें तो हम सीखते नहीं और सीखेंगे क्या तो जिसे दुनिया में हमने फेल होते देखा, भारत में जो उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण की नीति अपनाई गयी है वही नीति दक्षिण कोरिया ने अपनाया था, रूस ने अपनाया था, थाईलैंड ने अपनाया था , ब्राजील ने अपनाया था और सब के सब डूबे थे |               
 

भारत में एक प्रधानमंत्री हुए मोरारजी देसाई उनकी सरकार ने भारत में जितने भी Zero Technology के क्षेत्र में MNC (Multi National Company) काम कर रहे थे उनमे से अधिकांश को भारत से भगाया था | ये  Zero Technology वाले उत्पादों की संख्या लगभग 700 थी | और आप ध्यान दीजियेगा कि ये जितने भी MNC आये हैं वो उन्हीं क्षेत्रों में निवेश कर रहे हैं जिस क्षेत्र को मोरारजी देसाई की सरकार ने प्रतिबंधित किया था | मतलब जिन कंपनियों को मोरारजी देसाई की सरकार ने भगाया था सब की सब वापस आ गयी हैं | दूसरी बात, जितने भी MNC हैं वो कभी भी हमारे देश में आ के कोई technology के क्षेत्र में निवेश नहीं करते हैं | क्या कभी किसी कंपनी ने आ के यहाँ satellite बनाया या किसी ने मिसाइल बनाने में मदद की ? Technology इस देश में बाहर से जो भी आती है वो outdated /redundant होती है | 1991 में उदारीकरण (जिसे मैं उधारीकरण कहता हूँ ) के बाद जितने भी MoU (Memorandum of Understanding) sign हुए इस देश में सब के सब zero technology के क्षेत्र में हुए हैं | आप देखिएगा कि ये क्या बनाती हैं और बेचती हैं, ये बनाती है - साबुन,वाशिंग पावडर, आलू का चिप्स, टमाटर की चटनी, आम का आचार, बोतल का पानी, चोकलेट, बिस्कुट, पावरोटी, आदि, आदि | एक भी उदहारण कोई दे दे जब इन विदेशी कंपनियों ने तकनीक के क्षेत्र में निवेश किया हो | भारत ने अपने स्वदेशी तकनीक से सुपर कंप्यूटर बनाया, भारत ने अपने बूते मिसाइल बनाया, भारत ने अपने दम पर क्रायोजनिक इंजन बनाया, एक भी कंपनी ने भारत को तकनीक तो दूर सहयोग तक नहीं दिया | मारुती में जो सुजुकी का इंजन लगता है वो इंजन यहाँ नहीं जापान में बनता है, हीरो होंडा में जो इंजन लगता था वो जापान से बन के आता था , मतलब ये है कि अपने तकनीक को ये कम्पनियाँ शेयर नहीं करती वो कोई तकनीक जानते हैं तो आपको देते नहीं हैं और जब वही तकनीक उनके लिए पुरानी या बेकार हो जाती है तो वो उसे भारत में ला के dump कर देती हैं और हम खुश हो जाते हैं कि नयी तकनीक आयी है |
 

आप दुनिया में जितने भी विकसित देश देखेंगे वो सब स्वदेशी के बल पर आगे आये हैं | भारत को भी खड़ा करना है तो स्वदेशी के माध्यम से ही खड़ा किया जा सकता है | अगर आप विदेशियों पर निर्भर हैं या परावलम्बी है तो आप दुनिया में कभी कोई ताकत हासिल नहीं कर सकते | विदेशी वैसाखी पर, परावलम्बी होकर, विदेशी चिंतन से, विदेशी अर्थव्यवस्था की नीतियों की नक़ल से कोई देश कभी आगे नहीं आता, हर देश को आगे आने के लिए स्वदेशी का चिंतन, स्वदेशी का मनन और स्वदेशी का अनुपालन करना पड़ता है | 


15 अगस्त 1947 को भारत ऐसा नहीं था, भारत के ऊपर एक रूपये का विदेशी कर्ज नहीं था, भारत का व्यापार घाटा एक रूपये का नहीं था | एक डौलर की कीमत भारत के एक रुपया के बराबर थी, एक पोंड की कीमत एक रुपया के बराबर थी और एक जर्मन मार्क की कीमत भी एक रुपया थी, भारत आजाद हुआ तो भारत को आगे की तरफ बढ़ना चाहिए था लेकिन हुआ उल्टा | हमारे नीति निर्धारकों ने भारत को पश्चिम के रास्ते आगे बढ़ाने का प्रयास किया जो कि किसी भी दृष्टिकोण से बुद्धिमत्ता नहीं कही जा सकती है | आज का भारत कर्ज में डूबा हुआ भारत है, भारत की हर प्राकृतिक चीज विदेशियों के हाथ में चली गयी है, अब तो भारत के लोग भी भारतीय नहीं रहे, जब कोई राष्ट्र की बात करता है तो लोग उसे ही गालिया देने लगते हैं  | मैं भारत में पैदा हुआ और भारत की संस्कृति में पला-बढ़ा, और हमारे भारत की संस्कृति में मरने वाले के आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है लेकिन मैं भगवान से ये प्रार्थना करता हूँ कि इन 64 सालों में जिन-जिन शासकों ने भारत को इस दुष्चक्र में पहुँचाया है, उनकी आत्मा को कभी शांति प्रदान ना करें |   


जय हिंद
राजीव दीक्षित